डॉक्टर हेडगेवार, संघ और स्वतंत्रता संग्राम -10 – नरेन्द्र सहगल

खंडित भारत’ की आधी अधूरी’ राजनीतिक स्वतंत्रता

1942 में हुए ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन को अपना पूर्ण समर्थन देने के साथ स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने एक आशंका प्रकट करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को विशेषतया महात्मा गांधी जी को चेताया था ‘‘भारत छोड़ो’ का अंत कहीं भारत तोड़ो न हो जाए’’। ‘1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ जैसे ऐतिहासिक शोधग्रंथ के लेखक तथा अंडमान जेल में कोल्हू के बैल की तरह अमानवीय यातनाएं भोगने वाले बैरिस्टर विनायक दामोदर सावरकर की यह चेतावनी सत्य साबित हुई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग की पूर्ण सहमति के बाद विश्व के सबसे प्राचीन राष्ट्र के टुकड़े कर के अंग्रेज अपने घर चले गए। इस दुर्भाग्यशाली अवसर पर ‘अखंड भारत की पूर्ण स्वतंत्रता’ के लिए अपना सर्वस्व अपर्ण करने वाले लाखों स्वतंत्रता सेनानियों की आत्मा कितना रोई होगी, कितना तड़पी होगी, इसका अंदाजा वह कांग्रेसी नहीं लगा सकते जो हाथ में कटोरा लेकर अंग्रेजों से आजादी की भीख मांगते रहे।

1945 में हुए दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के तुरन्त पश्चात ही ब्रिटिश साम्राज्वाद के झंडाबरदार अंग्रेज शासक इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि अब भारत में उनका रहना और शासन करना सम्भव नहीं होगा। उन्हें अब भारत छोड़ना ही होगा। दुनिया के अधिकांश देशों पर अपना अधिपत्य जमाए रखने की उनकी शक्ति और संसाधन पूर्णतः समाप्त हो गए थे। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज ने जो स्वाधीनता संग्राम छेड़ा, उसने तो ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विनाश का बिगुल बजा दिया था। सुभाष चंद्र बोस ने स्वतंत्रता की गगनभेदी रणभेरी बजाकर जैसे ही ‘दिल्ली चलो’ का उदघोष किया, भारतीय सेना में विद्रोह की आग लग गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, वीर सावरकर और सुभाष चंद्र बोस के साथ पूर्व में बनी एक गुप्त योजना के अनुसार सेना में भर्ती हुए नौजवानों ने सरकार के खिलाफ कमर कस ली। यह जवान सैनिक प्रशिक्षण लेकर अंग्रेजों के ही खिलाफ युद्ध करेंगे, इसी उद्देश्य के साथ सेना में भर्ती हुए थे। इतिहासकार देवेन्द्र स्वरूप के अनुसार राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद गुप्तचर विभाग की रिपोर्टों में कहा गया है ‘‘20 सितम्बर 1943 को नागपुर में हुई संघ की एक गुप्त बैठक में जापान की सहायता से आजाद हिंद फौज के भारत की ओर होने वाले कूच के समय संघ की सम्भावित योजना के बारे में विचार हुआ था’’।

लिहाजा अंग्रेजों ने भारत छोड़ने के अपने मंतव्य की घोषणा कर दी और उसके लिए जून 1948 के अंत की समय सीमा भी तय कर दी। अब यह लगभग स्पष्ट हो गया था कि सदियों पुराना स्वतंत्रता संग्राम अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। । राजनीतिक पंडितों के अनुसार यदि कांग्रेस के नेता मात्र एक वर्ष और रुक जाते तो अखंड भारत की पूर्ण स्वतंत्रता का ध्येय साकार हो जाता। परन्तु कांग्रेस ने अंग्रेजों के जाल में फंसकर तुष्टीकरण पर आधारित अलगाववाद के आगे दंडवत प्रणाम किया और पृथकतावाद/साम्प्रदायवाद पर संविधानिक मोहर लगाकर राष्ट्रवाद की बलि चढ़ा दी।

विभाजन पूर्व के सारे घटनाक्रम के प्रत्यक्षदर्शी श्रीमान दत्तोपंत ठेंगड़ी के अनुसार ‘‘अंग्रेजों का भारत छोड़कर जाना अपरिहार्य ही हो गया था, परन्तु वास्तव में विभाजन अपरिहार्य नहीं था। इंडियन नेशनल कांग्रेस ने भारत की जनता को देशभक्तिपूर्ण आवाहन किया होता तो देश की अखंडता बनाए रखने हेतु सर्वोच्च त्याग करने के लिए लाखों की संख्या में लोग आगे बढ़ते’’। डॉक्टर अंबेडकर जैसे कानून पुरुष के मुताबिक ‘‘हमारी समझ में नहीं आता कि किस प्रकार का यह तथ्य है कि भारत में मुसलमान एक राष्ट्र हैं, यह तथ्य राजनीतिक अलगाववाद को सुरक्षित एवं ठोस बना देता है। दुभाग्यवश मुसलमान इस बात को नहीं समझते कि इस नीति के द्वारा मिस्टर जिन्ना ने उनका कितना नुकसान किया है’’। इसी तरह डॉक्टर लोहिया ने कहा था ‘‘नेताओं की तो अधोगति हुई वे सत्ता के लालच के फंदे में फंस गए’’।

संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस के अनुसार ‘‘इस व्यापक विरोध से बचने के लिए ब्रिटिश सरकार ने अपने भारत छोड़ने की पूर्व घोषित तिथि जून अंत 1948 के दस महीने पहले ही भारत छोड़ दिया’’। तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने भी माना था ‘‘इससे पूर्व कि देश के विभाजन के विरुद्ध कोई प्रभावशाली प्रतिरोध खड़ा हो सके, हमने समस्या का निवारण कर डाला’’।

15 अगस्त 1947 को हुआ भारत का यह विभाजन केवल मातृभूमि के टुकड़े का विभाजन नहीं था, चिरसनातन काल से भारतीय समाज द्वारा एक चैतन्यमयी देवी की तरह पूजित भारतमाता का खंडन, अपमान और असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों, हुतात्मा, संतो/महात्माओं के बलिदानों का महाविध्वंस था।

आर्यसमाज, सनातन धर्म सभा, हिन्दू महासभा, अभिनव भारत, आजाद हिंद फौज तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इत्यादि राष्ट्रभक्त हिन्दू संस्थाओं ने कभी भी भारत का विभाजन स्वीकार नहीं किया। अनेक संत महात्माओं ने पाकिस्तान निर्माण के खिलाफ अपनी आवाज उठाई। भारत विभाजन की त्रास्दी को रोकने के लिए सभी प्रयास पूरी ताकत से किए गए, परन्तु अंग्रेज शासकों, मुस्लिम लीग और बूढ़े हो चुके कांग्रेसी नेताओं पर पाकिस्तान के निर्माण का नशा इस कदर चढ़ चुका था कि अखंड भारत के समर्थकों की आवाज नक्कार खाने में तूती की आवाज बनकर रह गई।

पाकिस्तान की स्थापना का ऐलान होते ही देश के विभिन्न मुस्लिम इलाकों में मोहम्मद अली जिन्ना के इशारे पर हिन्दुओं पर जुल्मों का कहर प्रारम्भ हो गया। हिन्दुओं का साहूहिक नरसंहार, माताओं बहनों का सरेआम बलात्कार, आगजनी, लूटपाट और मारधाड़ आदि अपनी चरम सीमा पर पहुंच गए। 15 अगस्त से पहले और बाद में 30 लाख से ज्यादा लोगों की हत्याएं हुई। जिस समय भारत विभाजन के पहले हस्ताक्षर और खंडित भारत के पहले मनोनीत प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू दिल्ली में यूनियन जैक उतारकर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहरा रहे थे, उसी समय पाकिस्तान से उजड़े और खून से लथपथ लाखों हिन्दू भारत की सीमा में पहुंच रहे थे। भारतीय इलाकों में पहुंचने वाली लाशों और जख्मियों से भरी गाड़ियां आजादी की कीमत अदा कर रहीं थी। इस आजादी के लिए हुए असंख्य बलिदानों, फांसी के फंदो, कत्लोगारत और माताओं बहनों के चीत्कार के बीच उस समय कलेजा कांप उठा जब हमारे कानों में नेताओं द्वारा गाए जा रहे एक गीत की ये पंक्तियां सुनाईं दी – ‘‘दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल-दागी न कहीं तोप न बंदूक चलाई-दुश्मन के किले पर भी न की तूने चढ़ाई’’ इसी गीत में यह कहकर ‘‘चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल’’ गीतकार ने 1200 वर्ष तक निरंतर चले स्वतंत्रता संघर्ष को नकार दिया।

महात्मा गांधी जी के शब्दों में ‘‘अंग्रेज रहें, उनकी सभ्यता चली जाए, यह तो मुझे मंजूर है, परन्तु अंग्रेज चले जाएं और उनकी सभ्यता यहां राज करती रहे यह मुझे मंजूर नहीं, इसे मैं स्वराज्य कदापि नहीं मानता’’।

 

परिणाम स्वरूप स्वाधीन भारत में महात्मा गांधी जी के वैचारिक आधार स्वदेश, स्वदेशी, स्वधर्म, स्वभाषा, स्वसंस्कृति, राजराज्य, ग्राम स्वराज्य इत्यादि को तिलांजलि दे दी गई। परिणाम स्वरूप भारत में मानसिक पराधीनता का बोलबाला हो गया। देश को बांटने वाली विधर्मी/विदेशी मानसिकता के फलस्वरूप देश में अलगाववाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, सामाजिक विषमता,सांप्रदायिकता और जातिवाद इत्यादि ने अपने पांव पसारने शुरु कर दिए।

अतः जब तक भारत का भूगोल, संविधान, शिक्षा प्रणाली, आर्थिक नीति, संस्कृति, समाज रचना परसत्ता एवं विदेशी विचारधारा से प्रभावित और पश्चिम के अंधानुकरण पर आधारित रहेंगे तब तक भारत की पूर्ण स्वतंत्रता पर प्रश्चचिन्ह लगता रहेगा।

सर्वांग स्वतंत्रता/सर्वांगीण विकास’ की ओर संघ के बढ़ते कदम –

 

15 अगस्त 1947 को देश दो भागों में विभक्त हो गया। ‘इंडिया दैट इज भारत’ और ‘पाकिस्तान’। भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त होने बाद गांधी जी ने ‘कांग्रेस का काम पूरा हो गया अब इसे समाप्त कर के एक सेवादल के रूप में परिवर्तित कर देना चाहिए’ का सुझाव कांग्रेस के नेताओं के समक्ष रखा था। परन्तु सत्ता के मोह में फंस चुके कांग्रेस के नेताओं ने गांधी जी की एक न सुनी। दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य केवल राजनीतिक स्वाधीनता न होकर ‘अखंड भारत की सर्वांग स्वतंत्रता’ था अतः संघ ने अपना स्वतंत्रता संग्राम जारी रखा।

गांधी जी के अनुसार ‘‘ब्रिटिश शासकों ने भारत को पाश्चात्य शिक्षा, प्रशासन, संविधान तथा आर्थिक मकड़जाल में फंसा दिया था। स्वराज्य प्राप्ति के बाद यदि देश को इस विदेशी मकड़जाल से न निकाला गया तो स्वाधीनता का कोई अर्थ नहीं बचता’’। महात्मा गांधी जी की चेतावनी की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। अतः इस सरकारी नासमझी और भारत की श्रेष्ठ सांस्कृतिक धरोहर से मुंह मोड़ लेने के भयानक दुष्परिणाम सबके सामने हैं। हमारा भारत जो स्वतंत्रता आंदोलनों के समय एकजुट था वह अब भाषा, क्षेत्र, जाति, मजहब के आधार पर विभाजित हो गया है।

विभाजन के पूर्व स्वाधीनता आंदोलन के प्रत्येक मोर्चे, सशस्त्र क्रांति, सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन इत्यादि में बढ़चढ़ कर भाग लेने वाले ‘स्वयंसेवक सेनानियों’ ने राजनीतिक स्वाधीनता के बाद भी पूर्ण स्वतंत्रता अर्थात सर्वांगीण स्वतंत्रता के लिए अपने संग्राम को गतिशील बनाए रखा। जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद, गोवा इत्यादि रियासतों में भारत के संविधान तथा राष्ट्रध्वज तिरंगे की रक्षा के लिए संघ के स्वयंसेवकों द्वारा दिए गए बलिदान भारत के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। 1948-1962-1965-1971 में विदेशी आक्रमणों के समय भारतीय सेना की सहायता एवं अनेक प्रकार की प्रशासनिक व्यवस्था में योगदान करके संघ के स्वयंसेवकों ने अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को निभाकर यह साबित कर दिया था कि वे डॉक्टर हेडगेवार के पदचिन्हों पर दृढ़ता से चलते रहेंगे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रव्यापी स्वरूप को समझने के लिए इसके चतुष्कोणीय कार्य को गहराई से समझना आवश्यक है। संघ का प्रथम स्वरूप है प्रत्यक्ष शाखा का कार्य। संघ की शाखा एक ऐसा शक्ति-पुंज है, जहां से राष्ट्रप्रेम की विद्युत तरंगें उठकर समाज के प्रत्येक क्षेत्र को जगमगा रही हैं। संघ कार्य का दूसरा स्वरूप है संघ द्वारा संचालित विविध क्षेत्र -‘किसान, मजदूर, वनवासी, गिरीवासी, विद्यार्थी जगत, शिक्षा जगत, चिकित्सा जगत और सेवा’ से संबंधित अनेकों क्षेत्रों में संघ ने छोटे बड़े अनेकों संगठन खड़े किए हैं। यह सभी संगठन अपने-अपने क्षेत्र की परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार राष्ट्रीय जागरण का कार्य कर रहे हैं। संघ कार्य का तीसरा स्वरूप है स्वयंसेवकों द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर किए जा रहे राष्ट्रहित के कार्य। इस श्रेणी में विद्यालय, समाचार-पत्र, प्रकाशन,  लेखक कार्य, औषधालय, मंदिरों की व्यवस्था, अनेक प्रकार के सांस्कृतिक और सेवा प्रकल्प इत्यादि आते हैं। स्वयंसेवकों द्वारा चलाए जा रहे इन निजी प्रकल्पों के पीछे राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा विद्यमान रहती है। संघ कार्य अर्थात राष्ट्र-जागरण का चौथा स्वरूप बड़ा विस्तृत और महत्वपूर्ण है। इसमें हिन्दुत्व/राष्ट्र जागरण के वे सभी अभियान, आंदोलन, अध्यात्मिक संस्थान, सम्मेलन और धार्मिक संगठन आते हैं जो राष्ट्र के परमवैभव के लिए सक्रिय हैं। संघ का इन सभी संगठनों को पूरा सहयोग रहता है, यहां तक कि संघ के स्वयंसेवक बिना संघ का नाम लिए एक समाजसेवी और राष्ट्रभक्त नागरिक के नाते इन संगठनों में न केवल सक्रिय भूमिका निभाते हैं अपितु आवश्यकतानुसार संगठन तंत्र के सूत्रों को भी सम्भालते हैं।

संघ का वैचारिक आधार ‘हिन्दुत्व ही राष्ट्रीयत्व है’ यही भारत की ऐतिहासिक सच्चाई है। इसे साम्प्रदायिक, फासिस्ट, मुस्लिम विरोधी, जातिवादी, देश और समाज को तोड़ने वाली विचारधारा कहने वाले वही लोग हैं जिन्होंने स्वयं देश के टुकड़े किए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवको के कृतिरूप दर्शन का मूल्यांकन करते समय संघ के गैर राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप पर ही ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। वैसे भी संघ द्वारा संचालित गतिविधियों का साक्षात दर्शन ऐसे लोग कदाचित नहीं कर सकते, जो दलगत राजनीति के तंग जंजाल में फंसे हुए हैं। अपने राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाना संघ का उद्देश्य है और यह गैर राजनीतिक सांस्कृतिक धरातल पर ही प्राप्त होगा।

संघ के स्वयंसेवक इसी साधना में जुटे हैं और अपने कदमों को अंगद के पांवों की तरह जमाते जा रहे हैं। आज तो संघ के स्वयंसेवक देश में हो रहे प्रत्येक प्रकार के ठोस व्यवस्था परिवर्तन के प्रतीक बन रहे हैं। भ्रष्टाचार, कालाधन, अलगाववाद और आतंकवाद इत्यादि राष्ट्रघातक खतरों से जूझ रहे समाज को शक्ति प्रदान करने के काम में अग्रसर हो रहे स्वयंसेवक अपने रास्ते में आने वाली राजनीतिक और गैर राजनीतिक बाधाओं को हटाकर सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहे हैं। संघ विरोधी शक्तियां परास्त हो रही हैं। पूजनीय महात्मा गांधी की ‘राजराज्य’ की कल्पना साकार रूप ले रही है। भारत की सर्वांग स्वतंत्रता/सर्वांगीण विकास के अपने ध्येय की प्राप्ति के लिए संघ के स्वयंसेवक समाज को साथ लेकर आगे बढ़ रहे हैं। बहुत कुछ हो गया है, परन्तु बहुत कुछ रह भी गया है। जो रह गया है उसे प्राप्त करने के लिए संघ संघर्षरत है। विजय अवश्यम्भावी है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक समस्त देशवासियों को साथ लेकर राष्ट्र जागरण के कार्य में सक्रिय रहेंगे। परम पूजनीय सरसंघचालक श्रीमान मोहन भागवत के शब्दों में ‘‘वर्तमान में ऐसा उज्जवल दौर शुरु हो चुका है जिसमें भारत पहले से भी अधिक शक्तिशाली  विश्वगुरु के रूप में उभरेगा’’। —————–समाप्त ।।

  • नरेन्द्र सहगल  9811802320