डॉक्टर हेडगेवार, संघ और स्वतंत्रता संग्राम – II – नरेन्द्र सहगल

प्रथम विश्वयुद्ध के बादल -और विप्लव की तैय्यारी

नेशनल मेडिकल कॉलेज कलकत्ता से डॉक्टरी की डिग्री और क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति में सक्रिय रहकर क्रांति का विधिवत प्रशिक्षण लेकर डॉक्टर हेडगेवार नागपुर लौट आए। स्थान-स्थान से नौकरी की पेशकश और विवाह के लिए आने वाले प्रस्तावों का तांता लग गया। डॉक्टर साहब ने बेबाक अपने परिवार वालों एवं मित्रों से कह दिया ‘‘मैंने अविवाहित रहकर जन्मभर राष्ट्रकार्य करने का फैसला कर लिया है’’। इसके बाद विवाह और नौकरी के प्रस्ताव आने बंद हो गए और डॉक्टर साहब भी अपनी स्वनिर्धारित अंतिम मंजिल तक पहुंचने के लिए पूर्ण स्वतंत्र हो गए। उनकी यही पूर्ण स्वतंत्रता उन्हें देश की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के रास्ते पर ले गई।

कलकत्ता में अनुशीलन समिति के कई साथियों के साथ विस्तृत चर्चा करके डॉक्टर हेडगेवार ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से भी भयंकर महासमर की योजना पर विचार किया था। यह भी गंभीरता से चर्चा हुई थी कि जिन कारणों से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम राजनीतिक दृष्टि से विफल हुआ, उन विफलताओं को न दोहराया जाए। नागपुर पहुंचने के कुछ ही दिन बाद वे इस योजना को कार्यान्वित करने के उद्देश्य से शस्त्रों और व्यक्तियों को जुटाने में लग गए। डॉक्टर साहब की क्रांतिकारी मंडली ने यह विचार भी किया कि सेना में युवकों की भारी भरती करवा कर, सैनिक प्रशिक्षण प्राप्त करके अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह कर दिया जाए।

इसी समय विश्वयुद्ध के बादल बरसने प्रारम्भ हो गए। अंग्रेजों के समक्ष अपने विश्वस्तरीय साम्राज्य को बचाने का संकट खड़ा हो गया। भारत में भी अंग्रेजों की हालत दयनीय हो गई। देश के कोने-कोने तक फैल रही सशस्त्र क्रांति की चिंगारी, कांग्रेस के भीतर गर्म दल के लोकमान्य तिलक , बिपिनचंद्र पाल , लाला लाजपतराय जैसे राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा किया जा रहा स्वदेशी आंदोलन और आम भारतीयों के मन में विदेशी सत्ता को उखाड़ फैंकने के जज्बे में हो रही वृद्धि इत्यादि कुछ ऐसे कारण थे, जिनसे अंग्रेज शासक भयभीत होने लगे।

अतः इस अवसर पर उन्हें भारतीयों की मदद की जरूरत महसूस हुई। स्वभाविक ही अंग्रेजों को सशस्त्र क्रांति के संचालकों से मदद की कोई उम्मीद नहीं थी। व्यापारी बृद्धि वाले अंग्रेज शासक इस सच्चाई को भलीभांति जानते थे, इसलिए उन्होंने अपने (ए.ओ.ह्यूम) द्वारा गठित की गई कांग्रेस से सहायता की उम्मीद बांध ली। अंग्रेज शासकों ने यह भ्रम फैला दिया कि विश्वयुद्ध में अंग्रेजों की जीत होने के बाद भारत को उपनिवेश-राज्य (डोमिनियन स्टेट) का दर्जा दे दिया जाएगा। विदेशी शासकों की यह चाल सफल रही। कांग्रेस के दोनों ही धड़े उस भ्रमजाल में फंस गए। अंग्रेजों के लिए मदद जुटाने में लग गए।

डॉक्टर हेडगेवार के मतानुसार ‘‘ब्रिटिश साम्राज्य पर गहराया संकट भारत को स्वतंत्र करवाने का एक स्वर्णिम अवसर है’’ इस अवसर को गंवा देना हमारी उन भयंकर भूलों में एक और भूल जुड़ जाएगी, जो हमने पिछले 12 सौ वर्षों में अनेक बार की है। डॉक्टर साहब का विचार था कि ब्रिटेन की उस समय कमजोर सैन्य शक्ति का फायदा उठाना चाहिए और देशव्यापि सशस्त्र क्रांति का एक संगठित प्रयास करना चाहिए। डॉक्टर हेडगेवार ने कई दिनों तक चर्चा करके कांग्रेस के दोनों धड़ों के नेताओं को सहमत करने की कोशिश की, परन्तु इन पर न जाने क्यों इस मौके पर अंग्रेजों की सहायता करके-कुछ न कुछ तो प्राप्त कर ही लेंगे-का भूत सवार हो गया। यह भूत उस समय उतरा जब अंग्रेजों ने अपनी विजय के बाद भारतीयों को कुछ देने के बजाए अपने शिकंजे को और ज्यादा कस दिया।

विप्लवी क्रांतिकारी डॉक्टर हेडगेवार द्वारा शुरु होने वाले भावी विप्लव में इनके एक बालपन के साथी भाऊजी कांवरे नें कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया और उधर विदेशों में क्रांति की अलख जगा रहे रासबिहारी बोस भी इस महाविप्लव की सफलता के लिए काम में जुट गए। डॉक्टर साहब और उनके साथियों ने1916 के प्रारम्भिक दिनों में ही सशस्त्र क्रांति को सफल करने हेतु सभी प्रकार के साधन जुटाने के लिए मध्यप्रदेश और अन्य प्रांतों का प्रवास शुरु कर दिया। डॉक्टर जी के मध्य प्रांत, बंगाल और पंजाब के क्रांतिकारी नेताओं के साथ घनिष्ट संबंध पहले से ही थे। कई युवकों को सशस्त्र क्रांति के लिए तैयार करने हेतु अनेक प्रकार के प्रयास किए गए। कई स्थानों पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के मंचन प्रारम्भ किए गए। इसी तरह व्यायामशालाओं तथा वाचनालयों की स्थापना करके युवकों को सशस्त्र क्रांति का प्रशिक्षण दिया जाने लगा। जाहिर है इस तरह के प्रयासों का एक मंतव्य प्रशासन और पुलिस को भ्रमित करना भी था। इन केन्द्रों में युवकों को साहस, त्याग और क्षमता के अधार पर भर्ती किया जाता था। युवा क्रांतिकारियों को 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय की वीरतापूर्ण कथाओं, शिवाजी महाराज के जीवनचरित्र तथा अनुशीलन समिति के क्रांतिकारियों के साहसिक कार्यों की जानकारी दी जाती थी।

प्रखर राष्ट्रवाद की घुट्टी पिलाकर डॉक्टर साहब ने बहुत थोड़े समय में ही लगभग 200 क्रांतिकारियों को अपने साथ जोड़ लिया। इन्ही युवकों को बाहर के प्रांतों में क्रांतिकारी दलों के गठन का काम सौंपा गया। डॉक्टर हेडगेवार ने करीब 25 युवकों को वर्धा के एक अपने पुराने सहयोगी गंगा प्रसाद के नेतृत्व में उत्तर भारत के प्रांतों में सशस्त्र क्रांति की गतिविधियों के संचालन हेतु भेजा। इस व्यवस्था के लिए आवश्यक धन डॉक्टर साहब ने नागपुर में ही एकत्रित कर लिया था।

परन्तु 1917-18 का यह स्वतंत्रता आंदोलन कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं द्वारा विश्वयुद्ध में फंसे अंग्रेजों का साथ देने से बिना लड़े ही विफल हो गया। कांग्रेस के इस व्यवहार से भारत में अंग्रेजों के उखड़ते साम्राज्य के पांव पुनः जम गए, जिन्हें हिलाने के लिए 30 वर्ष और लग गए।

सशस्त्र क्रांति के द्वारा विदेशी हुकूमत के खिलाफ 1857 जैसे महाविप्लव का विचार और पूरी तैयारी जब अपने निर्धारित लक्ष्य को भेद नहीं सकी, तो भी डॉक्टर हेडगेवार के जीवनोद्देश्य में कोई कमी नहीं आई। जिस विश्वास, साहस और सूझबूझ के साथ उन्होंने शस्त्रों और युवकों को एकत्रित करके अंग्रेजों के साथ युद्ध की तैयारी की थी, उसी सूझबूझ के साथ डॉक्टर हेडगेवार ने सब कुछ शीघ्रता से निप्टाकर/ समेटकर अपने साथ जुड़े देशभक्त क्रांतिकारियों को अंग्रेजों के कोपभाजन से बचा लिया।

इस  कार्य को डॉक्टर साहब के अभिन्न साथियों अप्पाजी जोशी, बाबू राव हडकरे, नानाजी पुराणिक तथा गंगाप्रसाद पांडे की टीम ने बड़ी गुप्त रीति से सफलतापूर्वक सम्पन्न कर दिया।

महात्मा गांधी का उदय और उनके नेतृत्व को पूर्ण समर्थन –

उनके सामने एकमात्र अंतिम लक्ष्य अपनी मातृभूमि की पूर्ण स्वतंत्रता था। शेष सब प्रकार के मार्ग एवं तत्कालिक उद्देश्य उनके लिए किसी अंतिम ध्येय के विभिन्न रास्ते थे। यही वजह थी कि कांग्रेस द्वारा प्रायोजित आंदोलनों में पूरी शक्ति के साथ शिरकत करते हुए भी डॉक्टर हेडगेवार ने क्रांतिकारियों की सब प्रकार की गतिविधियों की जानकारी रखी और इनमें पूरा सहयोग भी करते रहे।

डॉक्टर साहब ने अपने कुछ कांग्रेसी मित्रों को साथ लेकर ‘‘नागपुर नेशनल यूनियन’’ की स्थापना की। इस संस्था ने सीना तानकर पूरी ताकत के साथ पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करते हुए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रचार प्रसार युद्ध स्तर पर प्रारम्भ कर दिया। इसी समय मध्य प्रांत की कांग्रेस समिति द्वारा एक हिन्दू साप्ताहिक पत्र ‘संकल्प’ प्रारम्भ करके डॉक्टर हेडगेवार को उसका संरक्षक नियुक्त कर दिया। डॉक्टर हेडगेवार ने इस जिम्मेदारी को भी पूरी तन्मयता से निभाया, इस हेतु उनके महाकौशल के प्रवास के समय अनेक हिन्दू युवक उनके सम्पर्क में आ गए।

यह कार्यकाल 1919 का था। नागपुर में रहते हुए डॉक्टर हेडगेवार ने विद्यार्थियों की सभाओं में देशभक्ति पूर्ण भाषण देने शुरु कर दिए। जब अनेक युवा कुछ करने के लिए तैयार हो गए, उनके इस उत्साह को दिशा देने के लिए डॉक्टर हेडगेवार ने एक और संस्था ‘‘राष्ट्रीय उत्सव मंडल’’ का गठन किया। वे स्वयं कई वर्षों तक उसके महामंत्री की जिम्मेदारी निभाते रहे। इस संस्था के अनेकविध कार्यक्रमों में छात्रों को हिन्दू धर्म, राष्ट्रीय संस्कृति, स्वतंत्रता का महत्व तथा ब्रिटिश सरकार के द्वारा हिन्दुओं के अस्तित्व को ही मिटा देने के षड्यंत्र की जानकारी दी जाती थी। मध्य प्रांत के गणमान्य नेता डॉक्टर मुंजे,लोकमान्य अणे, शरद पेंडसे के भाषण इस संस्था की सभाओं में होने लगे। विभिन्न भाषा तथा मजहबों से जुड़े युवा लोग भारतमाता की आराधना करने लगे और देखते ही देखते एक शक्तिशाली संगठन का स्वरूप सामने आना प्रारम्भ हो गया।

इसी दौरान 1920 में होने वाले कांग्रेस के अधिवेशन को नागपुर में करने का निश्चय हुआ। उसे सफल बनाने के लिए तैयारियां प्रारम्भ हो गईं। इस हेतु कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता डॉ. परांजपे ने डॉक्टर हेडगेवार की सहायता से जनवरी 1920 में‘भारत सेवक मंडल’ की स्थापना की। सार्वजनिक गतिविधियों को सुचारू ढंग से चलाने के लिए और सेवाभावी युवकों को वॉलिंटियर बनाने के लिए गठित हुए इस ‘भारत सेवा मंडल’ के प्रमुख की जिम्मेदारी डॉक्टर हेडगेवार को दी गई। उन्हीं के प्रयासों के फलस्वरूप इस मंडल में एक हजार से ज्यादा युवकों की भर्ती हो गई। इसी बीच अधिवेशन के प्रचार प्रसार के लिए जन समितियों का गठन किया गया, उनमें स्वागत समिति में डॉक्टर हेडगेवार को प्रमुख स्थान दिया गया।

दिनांक 26 दिसम्बर 1920 को कांग्रेस का अधिवेशन शुरु हो गया। इससे पूर्व डॉक्टर हेडगेवार और उनके कांग्रेसी मित्रों ने एक प्रस्ताव ‘‘पूर्ण स्वतंत्रता ही हमारा उद्देश्य है’’ तैयार करके गांधी जी के समक्ष रखा। परन्तु गांधी जी ने विनम्र भाव से इतना ही कहा कि ‘‘स्वराज्य में पूर्ण स्वतंत्रता का समावेश हो जाता है’’ और प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इस पर भी डॉक्टर जी तथा उनके साथी उस अधिवेशन की तैयारी एवं व्यवस्था में पूरी शक्ति से जुटे रहे। यह अधिवेशन अब तक के हुए अधिवेशनों में सबसे बड़ा था। स्वयंसेवकों के प्रमुख के नाते डॉक्टर हेडगेवार ने थोड़ा समय और अधिक संख्या का ध्यान रखते हुए अति उत्तम व्यवस्था की। इस अधिवेशन में डॉक्टर हेडगेवार ने अनुभव किया कि सेवा भाव से काम करने वाला स्वयंसेवक यदि अनुशासित, समर्पित और दृढ़ मानसिकता वाला नहीं हुआ तो कभी भी पथ से विचलित होकर अपने ध्येय को छोड़कर भाग सकता है।

इसी तरह विषय समिति की बैठक में डॉक्टर हेडगेवार ने कांग्रेस के उद्देश्य के सम्बंध में प्रस्ताव रखा, ‘‘भारतीय गणतंत्र की स्थापना करना तथा पूंजिवादी अत्याचारों से राष्ट्रों को मुक्त करना’’। इस प्रस्ताव की भाषा से पता चलता है कि डॉक्टर हेडगेवार ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अंतर्राष्ट्रीय मंच का विषय बनाकर विश्व के सभी देशों को ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर प्रहार करने की प्रेरणा देने का प्रयास किया था। इतनी गहरी और दूरदर्शिता पूर्ण रणनीति थी ये। परन्तु कांग्रेस में इस सोच का आधार समझने वालों की कमी के कारण यह प्रस्ताव भी पारित नहीं हो सका।

अब वे कांग्रेस के नेता भी कहलाने लगे। डॉक्टर जी के एक साथी नारायण हरि पालकर ने डॉक्टर जी की जीवनी में लिखा है ‘‘डाक्टर जी को राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए जैसे हिंसा से घृणा नहीं थी, वैसे ही उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए असहयोग आंदोलन से भी उनका असहयोग नहीं था। विदेशियों को किसी भी मार्ग से बाहर निकालने के लिए आगे आने वाले व्यक्ति पर डॉक्टर जी को अभिमान होता था। इसीलिए वे उसके साथ भरसक सहयोग करते थे’’।

-क्रमशः –