देश के आजादी मे संघ का योगदान –

 कांग्रेस के नेताओं की रक्षा संघ ने की-

सितम्बर १९४६ मे कांग्रेस और मुस्लिम लीग की मिली जुली सरकार का केंद्रीय असेम्बली मे  अधिवेशन प्रारंभ हुवा, तब लीगी गुंडों ने विरोध  प्रदर्शन और पथराव कर कांग्रेसी नेतोओं को अपनामित किया | अपनी योजना को सफल होते देख अगले दिन और अधिक संख्या मे लीगी एकत्र हुए | तब दिल्ली मे कांग्रेसी नेता देशबंधु गुप्त ने संघ कार्यालय जाकर संघ के अधिकारियो से सहायता मांगी | संघ ने इस चुनौती को स्वीकार किया , सेकोड़ो स्वयंसेवक तैयार होकर असेम्बली पहुंचे | वीरव्रती स्वयंसेवकोंकी टोलिया को अता देखा कर लीगी गुंडे भाग गये और अधिवेशन शांतिपूर्ण संपन्न हुवा |

प. नेहरु की सभा की रक्षा की –

उसी वर्ष सिंध (हैदराबाद ) मे प.नेहरु की एक आमसभा आयोजित की गयी थी | आशंका का थी की लीगी गुंडे इस सभा मे व्यवधान डालेंगे | कांग्रेस तबतक अखंड भारत के पक्ष मे थी | सिंध मे संघ एक बड़ी शक्ति बन चूका था | शहरी इलाकों मे संघ की पैठ थी | कांग्रेसी नेता चिमनदास ने संघ अधिकारियों से मिलकर इस सभा की रक्षा हेतु सहायता मांगी | संघ के स्वयंसेवक चौकाने रहकर सभाकी रक्षा की सभा को सफल किया |

म.गांधीजी की रक्षा की –

उन दिनों गांधीजी दिल्ली की भंगी कालोनी (आजकल वाल्मीकि वस्ती ) के वाल्मीकि मंदिर मे रह रहे थे | निकट ही मुस्लिम लीग का बड़ा अड्डा था | गांधीजी पर आक्रमण के संकेत मिल रहे थे | पुलिस की सुरक्षा के लिए स्वयं गांधीजी तैयार नहीं थे | तब गांधीजी के निकट सहयोगी श्री  कृष्णा अय्यर ने दिल्ली के प्रान्त प्रचारक श्री वसंतराव ओक से गांधीजी के सुरक्षा के लिये संघ की सहायता मांगी , और स्वयंसेवकों ने दिनरात गांधीजी के चारो और रहकर गांधीजी की पूर्ण सुरक्षा की |

भारतीय रियासते –

भारत की स्वतंत्रता की घोषणा के साथ ही अंग्रेजो ने सभी ५६२  रियासतों को मुक्त कर दिया | उनके विलय का फैसला उनको खुद के ऊपर छोड़ दिया | सरदार पटेल की सूझ बुझ से सभी रियासते एक एक कर भारत मे विलय हो गयी परन्तु जम्मू कश्मीर , हैदराबाद का निजाम , तथा गुजरात के  जुनागढ के नबाब महाबत खान, और भोपाल  स्वतन्त्र रहे | ९ नवम्बर १९४७ ने इंडियन आर्मी ने जूनागढ़ मे घुसकर उसपर कब्ज़ा बना लिया | फरबरी मे जनमत संग्रह हुवा और जूनागढ़ मे भारत का तिरंगा लहराया |

हैद्राबाद विलय मे संघ का योगदान

हैदराबाद का निजाम उस्मान अली खान दुनिया का एक आमिर खानदान था | रियासत की ८० % आबादी हिन्दू लेकिन वहा मुसलमान प्रशासन था |उसने ११ जून १९४७ मे ही हैदराबाद को स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया था | उस समय उनके पास ४०००० की सेना और  कासिम राजवी जैसा कट्टर रजाकारों का भारत विरोधी संघटन था | उन्होंने प्राय सभी जगह हिन्दुओ पर अत्याचार करना प्रारंभ किया | परभणी तथा नांदेड जिलो पर  पूरी तरह आतंक छाया हुआ था | हिन्दुओ की हत्या, महिलओं से बलात्कार और भारी संख्या मे हिन्दू मकानों , कालोनियों को आग लगाकर जलाना शुरू हुआ| इस समय कम्युनिस्ट भी रजाकारो का साथ दे रहे थे | संघ के स्वयंसेवक , आर्य समाज के लोग इसका राजकारी तांडव का पुरे बहादुरी से सामना करते रहे | अत १३ सितम्बर १९४८ मे भारत के सेना ने हैद्राबाद मे प्रवेश किया | १२०० रजाकार मार दिये गये , १०९ सैनिको को वीरगति प्राप्त हुयी | ५ दिन के संघर्ष के बाद  हैदराबाद को भारत का अंग बना लिया गया |

जम्मू कश्मीर का विलय

महाराज हरिसिंह ने स्वतंत्र रहना चाहते थे | परन्तु पाकिस्तानी सैनिको का आक्रमण से जम्मू कश्मीर पर पाकिस्तानी विध्वंस तथा  विलय की आशंका का प्रश्न विकराल बन सामने उभरा |कबाइलीयों के वेष मे पाकिस्तानी सेना श्रीनगर पर आक्रमण की योजना बनाने लगी | संघ के द्वितीय  सरसंघचालक श्री माधवराव गोलवलकर उपाख्य श्री  गुरूजी भारत के गृह मंत्री   श्री वल्लभभाई पटेल के कहने पर १७ अक्तूबर १९४७ मे स्वयम श्रीनगर पहुंचे | दुसरे दिन राजा के साथ उनकी भेट वार्ता हुयी | श्री गुरूजी की  सुझबुझ ने राजा  हरिसिंह के सारी आशंकाए दूर की| इस भेट से हिन्दू जनता मे भी आत्मविश्वास और संकल्प शक्ति का संचार हुवा | जिसका परिणाम मिला , स्वयंसेवक जम्मू कश्मीर के सुरक्षा के लिए आगे आये | फिर चाहे हवाई पट्टी की मरम्मत करना हो या पाकिस्तानी सीमा पर भारतीय सेना को रसद गोला बारूद लाना हो अथवा लीगी गुंडों के साथ मुकाबला करना हो , स्वयंसेवकों  ने अपना जीवन का बलिदान भी दिया | २६ अक्तूबर १९४७ मे  राजा हरिसिंह ने जम्मू कश्मीरका भारत मे विलय के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये और सदियों पुराना भारत का सिरमोर मुकुटमणि भारत का शीर्ष अंग बन गया |

                   —   साभार,  पथिक सन्देश दिसंबर-१७ के अंक से