1857 का स्वतंत्रता संग्राम

1857 का स्वतंत्रता संग्राम

(कारण – भ्रम – देशव्यापी प्रयास – समाज जीवन पर प्रभाव)

भारत में कौन सा भारतीय होगा जो 1857 के महासमर की घटनाओं को सुनकर गौरव अनुभव न करे। यह विश्व की अद्भुत, आश्चर्यजनक तथा बेजोड़ घटना है। इसने समूचे विश्व को हिलाकर रख दिया। यह साम्राज्यवादी अंग्रेज सरकार के लिए भारतवासियों की सामूहिक व देशव्यापी पहली  चुनोती थी।लाखों व्यक्ति इसमें मारे गए। अंग्रेजों ने केवल नरसंहार ही नहीं अपितु भयंकर लूटमार भी की थी। लगातार एक वर्ष से भी अधिक चला था यह संग्राम।

 

  • यह भ्रम फैलाया गया कि संग्राम केवल उत्तर भारत का था। वास्तव में पूरे भारत ने स्वतन्त्रता की यह लड़ाई लड़ी है। पूरा देश लड़ा सभी वर्ग लड़े. सैनिक, सामंत, किसान, मजदूर, दलित, महिला, बुद्धिजीवी सभी वर्ग लड़े थे।जस्टिस मैकार्थी ने हिस्ट्री ऑफ अवर ओन टाइम्स में लिखा है – ‘वास्तविकता यह है कि हिंदुस्तान के उत्तर एवं उत्तर पश्चिम के सम्पूर्ण भूभाग की जनता द्वारा अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किया गया था।’
  • 1857 का स्वतन्र्ता संग्राम सत्ता पर बैठे राजाओं और कुछ सैनिकों की सनक मात्र नहीं था। वह प्रयास असफल भले ही हुआ हो पर भविष्य के लिए परिणामकारी रहा। सारी पाशविकता के बावजूद अंग्रेज हिंदुस्थानी जनता की स्वतंत्रता प्राप्ति की इच्छा को दबा नहीं सके थे।
  • अंग्रेजों ने हिंदुस्थानी जनता की स्वतंत्रता प्राप्त करने की तीव्र इच्छा को बुरी तरह से कुचल दिया था, ऐसा कहा जाता है – वास्तविकता यह है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के संयुक्त प्रयासों की यह शुरुआत थी। अंग्रेजों का जुए को कंधे से उतार फैंकने की जो शुरुआत हुई थी, वह न केवल जारी रही अपितु भविष्य के भारत को व्यापक रूप से प्रभावित किया है।
  • जिस किसी ने भी स्वतन्त्रता महायज्ञ में अपना योगदान दिया वे सभी वन्दनीय हैं।

सावरकर – “जिन लोगों में और कुछ करने का साहस अथवा सामर्थ्य नहीं था, पर अपने इष्ट देवता की पूजा करते समय इतनी प्रार्थना भर की हो कि ‘मेरी मातृभूमि स्वतन्त्र कर दो’, उनका भी स्वतन्त्रता प्राप्ति में स्थान है।”

  • 1857 के पश्चात तीन महत्वपूर्ण पक्ष हैं।
  1. विभिन्न व्यक्तियों व संस्थाओं द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए सत्याग्रह व सशस्त्र क्रांति थी.
  2. विदेश प्रवास कर स्वतन्त्रता के पक्ष में वातावरण तैयार किया व स्वाधीनता के लिए हिंदुस्थान में हो रहे प्रयासों को सहायता की।
  3. सम्पूर्ण देश में सत्याग्रह व आंदोलनों ने अखिल भारतीय स्वरूप प्रयास किया।
  • सरदार पणिकर ‘ए सर्वे ऑफ इंडियन हिस्ट्री’ में लिखते हैं -”सबका एक ही और समान उद्देश्य था – ब्रिटिशों को देश से बाहर निकालकर राष्ट्रीय स्वतन्त्रता प्राप्त करना। इस दृष्टि से उसे विद्रोह नहीं कह सकेंगे। वह एक महान राष्ट्रीय उत्थान था।”
  • शिवपुरी छावनी में न्यायाधीश के सामने तात्या टोपे ने कहा -”ब्रिटिशों से संघर्ष के कारण मृत्यु के मुख की ओर जाना पड़ सकता है, यह मैं अच्छी तरह से जानता हूँ। मुझे न किसी न्यायालय की आवश्यकता है न ही मुकदमें में भाग लेना है।”
  • वासुदेव बलवंत फड़के -”हे हिन्दुस्तानवासियो! मैं भी दधीचि के समान मृत्यु को स्वीकार क्यों न करूँ? अपने आत्म समर्पण से आपको गुलामी व दुःख से मुक्त करने का प्रयास क्यों न करूं? आप सबको अंतिम प्रणाम करता हूँ।”
  • ‘अमृत बाजार पत्रिका’ ने नवम्बर 1879 में वसुदेव बलवंत फड़के के बारे में लिखा था -”उनमें वे सब महान विभूतियां थी जो संसार में महत्कार्य सिद्धि के लिए भेजी जाती हैं।  वे देवदूत थे। उनके व्यक्त्वि की ऊंचाई सामान्य मानव के मुकाबले सतपुड़ा व हिमालय से तुलना जैसी अनुभव होगी।”

हिन्दुस्थान का ईसाईकरण

ईस्ट इंडिया कम्पनी का हिन्दुस्थान के ईसाईकरण पर जोर था. सैनिक छावनियों में राम, कृष्ण, पैगम्बर, वेद व कुरआन को ईसाई मिशनरी गालियाँ देते थे हिन्दुस्तानी सैनिक द्वारा विरोध करने पर उसे सज़ा दी जाती थी| सैनिकों के थोक मतान्तरण से असंतोष अन्दर ही अन्दर खदबदाने लगा| सरकारी सहायता से ईसाई मिशनरियों बढ़ने लगीं|

  • हिन्दुस्थान के ईसाई के सम्बन्ध में 1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर के अध्यक्ष ने हाउस ऑफ कॉमंस में अपने भाषण में कहा –“ईश्वर ने हिन्दुस्थान का विशाल साम्राज्य इग्लैंड के हवाले किया है| वह इसलिए कि हिन्दुस्थान के एक छोर से दूसरे छोर तक ईसाई ध्वज लहराये| प्रत्येक को अपना समस्त सामर्थ्य लगाकर हिन्दुस्थान को ईसाई बनाने के महान कार्य करने में पूरा परिश्रम करना चाहिए, ताकि कोई कसर बाकी न रहे|”

 

  • मतान्तरण का कुचक्र सैनिकों में भी चलाया गया| बंगाली थलसेना के एक अधिकारी ने अपने प्रतिवेदन में लिखा है – “मैं पिछले 28 वर्ष से सैनिकों को ईसाई बनाने का काम सातत्य से करता रहा क्योंकि भारतीय सैनिकों को शैतान के पंजे से छुड़ाकर ईसा की शरण में लाना मेरा सैनिकी कर्तव्य था|”

(सन्दर्भ : 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के प्रतिसाद; लेखक – श्रीधर पराडकर)