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हिन्दू साम्राज्य दिवस के अवसर पर नागपुर में २०१० में सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत का उद्बोधन- भाग २

शिवाजी का सुशासन

बहुत सी बाते उन्होंने ऐसी की जो यदि आज की जाती है तो लोग कहेंगे कि ये पुरोगामी कदम है। उस जमाने में जब समाजवाद, साम्यवाद का दूर दूर तक नाम नहीं था शिवाजी महाराज ने जमींदारो को, वतनदारी को रद्द कर दिया। समाज के संपत्ति पर हम लोग ट्रस्टी रह सकते है। हम लोग अधिकारी नहीं बन सकते। यह समाज की संपत्ति है, समाज की व्यवस्था देखनेवाले राज्य के अधीन रहे किसी व्यक्ति को यह नहीं दी जायेगी। संभालने के लिये दी जायेगी। ओहदा रहेगा, सत्ता नहीं रहेगी। वतनदारी को रद्द कर दिया। उस समय के सरदार जागीरदारोंकी निजी सेनाएँ होती थी। शिवाजी महाराज ने यह पद्धति बदल दी व सेना को स्वराज्य के केन्द्रीय प्रशासन से वेतन देना प्रारम्भ कर सैनिको की व्यक्तिपर निष्ठाओंको राष्ट्रपर बनाया। उनके राज्य में सभी सैनिकों के अश्वों का स्वामित्व स्वराज्य के केन्द्रीय प्रशासन के पास था। गरीब किसानों को उनके जमीन का स्तर व फसल के उत्पादन के आधारपर राहत देनेवाली द्विस्तरीय वित्तीय करप्रणाली उन्होंने लागू की। तालाब, जलकूप खुदवाये, जंगल लगवाये, धर्मशालाएँ, मंदिर व रास्तोंका निर्माण करवाया।

शिवाजी महाराज ने समयानुसार समाज में जो जो परिवर्तन होना चाहिये वह सोचकर परिवर्तन किया। बेधडक किया। नेताजी पालकर को वापस हिंदू बना लिया, बजाजी निंबालकर को फिर से हिंदू बना लिया। केवल बना ही नहीं लिया उन को समाज में स्थापित करने के लिये उन से अपना रिश्ता जोड दिया। विवेक था। दृष्टि थी। तलवार के बल पर इस्लामीकरण हो रहा था। शिवाजी महाराज की दृष्टि क्या थी? विदेशी मुसलमानों को चुन चुन कर उन्होंने बाहर कर दिया। अपने ही समाज से मुस्लिम बने समाज के वर्ग को आत्मसात करने हेतु अपनाने की प्रक्रिया उन्होंने चलायी। कुतुबशाहा को अभय दिया। लेकिन अभय देते समय यह बताया की तुम्हारे दरबार में जो तुम्हारे पहले दो वजीर होंगे वे हिंदू होंगे। उसके अनुसार व्यंकण्णा और मादण्णा नाम के दो वजीर नियुक्त हुए और दूसरी शर्त ये थी की हिंदू प्रजा पर कोई अत्याचार नहीं होगा।

पोर्तुगीज गव्हर्नर और पोर्तुगीज सेना की शह पर मतांतरण करने मिशनरी आये है ये समझते ही गोवा पर चढ गये। इन को हजम करना है इस का मतलब अपने धर्म के बारे में ढुल मुल नीति नहीं। सीधा आक्रमण किया। चिपळूण के पास गये। परशुराम मंदिर को फिर से खडा किया। औरंगजेब के आदेश से, तब काशी विश्वेश्वर का मंदिर टूटा था। औरंजेब को पत्र लिखा कि तुम राजा बने हो, दैवयोग से और ईश्वर की कृपा से। और ईश्वर की आँखों में सारी प्रजा समान है। ईश्वर हिंदु मुसलमान ऐसा भेद नहीं करता। तुम न्याय से उसका प्रतिपालन करो, तुम अगर हिंदूंओं के मंदिर तोडने जैसे कारनामे करोगे तो मेरी तलवार लेकर मुझे उत्तर में आना पडेगा। शिवाजी महाराज का राज्य वहाँ नहीं था। शिवाजी महाराज का राज्य बहुत छोटा था। दक्षिण में था। शिवाजी महाराज के जीवन काल में वह राज्य काशी तक जायेगा ऐसी भविष्यवाणी कोई कर नहीं सकता था। फिर भी शिवाजी महाराज ने यह पत्र लिखा क्यों कि काशी विश्वेश्वर हमारे राष्ट्र का श्रद्धास्थान है। यह मेरा राष्ट्र कार्य है। लेकिन ऐसा करते समय जो मुसलमान बन गये है उनका क्या करना? प्रेम से जोडो। बने तक वापस लाओ। ये सारी दृष्टि उन की करनी में थी।

समय कहाँ जा रहा है और क्या करना चाहिये इसकी अद्भुत दृष्टि उनके पास थी और इसलिये युरोप से मुद्रण करनेवाला, एक यंत्र,  पुराना कीले लगाकर छाप करने वाला, उस को मंगवाकर, उसका अध्ययन करते हुए वैसा यंत्र बनाने का प्रयास, मुद्रण कला शुरू करने का प्रयास उन्होंने करवाया। विदेशियों से अच्छी तोपे, अच्छी तलवारे ली और वैसी तोपे, वैसी तलवार अपने यहां बने इस की चिंता की। उन्होंने स्वराज्य की सुरक्षा के लिये एक बहुत पक्का सूचना तंत्र गुप्तचरों के सुगठित व्यापाक जाल के माध्यम से खडा किया था। सागरी सीमा अपने देश की सुरक्षा है, वहाँ से ही आक्रमण के लिये सीधा रास्ता हो सकता है, क्योंकि अब पानी के जहाज बन गये है तो अपना भी नौदल चाहिये। उन्होने अपने नौदल का गठन किया। विदेशियों की नौ निर्माण कला और अपने ग्रंथों की नौ निर्माण कला की तुलना करते हुए अपने देश के अनुकूल नई नौ निर्माण कला का विद्वानों से सृजन कराया, और वैसे जहाज बनवाये। सिन्धुदुर्ग, सुवर्णदुर्ग, पद्मदुर्ग, विजयदुर्ग ऐसे जलदुर्ग बनवाये। कितनी व्यापक दृष्टि होगी और कहाँ तक देखते होंगे। वे केवल उस समय का विचार नहीं करते थे। मात्र एक सुलतान को पराजित कर अपना स्वराज्य बनाना केवल इतना नहीं। इस स्वराज्य को सुरक्षित करना है। इस समाज को समयानुकूल बना कर विश्व का सिरमोर समाज इस नाते खडा करना है।

यह शब्द वे केवल बोले नहीं है, उन की कृति बता रही है। कितने ही ऐसे उदाहरण है। और इसलिये उन का राज्य सुशासन था। राज्य के निर्णय प्रशासन व अमात्यों के साथ चर्चा होकर सहमति से किये जाते थे। लोगों की भाषा में प्रशासन चलाने के लिये उन्होंने राज्यव्यवहारकोष बनाकर विदेशी फारसी भाषा का उपयोग समाप्त किया। गोवंशहत्या प्रतिबंधित की। स्वधर्म का, स्वदेशी यानी स्वशासन शिवाजी महाराज ने लागू किया। उसका आज्ञापत्र प्रसिद्ध है। कितनी छोटी छोटी बातों की चिंता की है। उनका शासन सुशासन था याने क्या था? लोकाभिमुख था। सेना को कहते है कि तुम जाओगे और अपना कैम्प करोगे, शिविर करोगे, तो उस समय ध्यान रखना कि आसपास की प्रजा के खेत का माल बिना उन की अनुमति लेना नहीं, और रस्सी का टुकडा भी प्रजा से लोगे तो उन को उचित दाम देना। अपने यहाँ पर कचरा, रस्सियाँ वगैरे ऐसे ही पडे नहीं रहने देना क्यों कि चिलम पीनेवालों की चिलम का सुलगाया हुआ अंश वहाँ गिर जायेगा तो वह कचरा जल उठेगा और उस से आग लग सकती है। छोटी छोटी बाते है दक्षता और लोकाभिमुख न्याय की। न्यायी प्रशासन तो था ही उनका। पुणे की जागीर को सम्हालना उन्होंने अभी अभी प्रारम्भ ही किया था तब की घटना है,

रांझा नामक गाव के पाटील (ग्रामाधिकारी) ने अपने सत्ता के मद में ग्राम के ही एक निरीह महिला पर बलात्कार किया। शिवाजी महाराज ने अपने सैनिकों को भेजकर उसको रस्सियों से बांधकर अपने सामने हाजिर करवाया व उसके हाथ पैर काटकर उसको सजा दी। तब से यह बात कि उन्मत्तों का दमन नहीं हुआ, प्रजा की शिकायत है और उस में शासन की कोई दखल नहीं है ऐसा बिलकुल नहीं होता था। क्या योग्य है, क्या अयोग्य है यह देखकर योग्य ही होगा और कोई अयोग्य करता होगा तो उस को सजा होगी। जितना आदमी बडा उस के लिये उतनी कठोर, छोटा आदमी है तो उस के गलती करने में से भी कोई उपयोगी बात होती हो तो उसकी कदर करना। हिरकणी ग्वालन की कथा प्रसिद्ध है। वह दूध बेचने के लिये रायगढ किले पर आया करती थी। एक दिन देर तक किले पर रह गयी। नियमानुसार किले के सब द्वार सूर्यास्त के बाद बंद कर दिये गये। वह गाँव में वापस कैसे जाये? पहाड के नीचे अपने गाँव में घर पर छोडे आये अपने शिशु की चिन्ता से वह व्याकुल हुई। उसी व्याकुलता में किले के पहाड की एक दुर्गम चट्टान से कूदकर किले के बाहर निकल गयी। शिवाजी महाराज को यह ज्ञात हुआ। एक ओर उन्होंने हिरकणी ग्वालन को दरबार में बुलाकर उसके साहस का अभिनन्दन किया था दूसरी ओर उस चट्टान को तुडवाकर, अधिक दुर्गम बनाकर, उसपर एक बुर्ज बनाकर वह रास्ता बंद किया। आज भी उस बुर्ज को “हिरकणी बुर्ज” कहते है।

इतिहास यह बताता है कि वो स्पर्धाएँ करते थे दुर्ग बनाते समय या पुराने दुर्गों को नया बनाते समय की इस दुर्ग पर दुर्गम मार्ग से चढकर आकर बताओ कि कितने रास्ते हो सकते है। और जितने रास्ते स्पर्धकों को मिलते थे उसमें से एक रखकर बाकी सबको उडा देते थे, और यशस्वी स्पर्धकों को पुरस्कार देते थे। ऐसा प्रजाभिमुख, दक्ष, न्यायी शासन उनका था। उस में भेदभाव नहीं था। उस में कदर थी। उस में कठोरता थी। प्रजाभिमुख, सहृदय शासन था, लेकिन सहृदय का मतलब लुंजुपुंज ढीला प्रशासन नहीं था। बहुत कठोर था। किसी की परवाह नहीं होती थी, अपने पुत्र तक की उन्होंने परवाह नहीं की। कान्होजी जेधे ने उनसे कहा खंडोजी खोपडे ने गलती की लेकिन उससे हमारा अच्छा संबंध है। उसको माफ कर दो। मित्र का शब्द तो रखा उन्होने, माफ कर दिया, मारा नहीं, लेकिन हाथ पैर काट दिये और बताया कि आपने बताया इस लिये जान से नहीं मारा लेकिन जिस हाथ से उस ने गद्दारी की और जिस पैरे से चल कर गया वे पैर और हाथ मैने काट दिये। क्षमा नहीं की, कठोर थे। ऐसा कठोर, न्यायी, प्रजाहितदक्ष, प्रजाभिमुख और फिर भी सहृदय शासन उनका था। स्वयं शिवाजी महाराज नेतृत्व के आदर्श थे शिवाजी महाराज के चारित्र्य के बारे में तो उन का विरोधक भी बात नहीं कर सकता। कल्याण सुभेदार की बहू की कहानी बहुत प्रसिद्ध है। ऐसे कई उदाहरण है शिवाजी महाराज के। अत्यंत लोकप्रिय सर्वसत्तासंपन्न राजा बनने के बाद भी सज्जनों के सामने विनम्र होते थे। कला गुणों की कदर करते थे। रसिया थे, स्वयं करते थे और फिर लोगों से कहते थे। साहस था, विजय का विश्वास था, नीतिनिपुण थे। काम करने की कुशलता थी, हर बात को उत्तम कैसे करना इसका गुरू मंत्र उनके पास रहता था। समर्थ रामदास स्वामी जैसे अत्यंत विलक्षण व्यक्ति के द्वारा ऐसी प्रशंसा जिनको मिली है वे शिवाजी महाराज थे।

‘शिवरायाचे आठवावे रूप, शिवरायाचा आठवावा प्रताप,
शिवरायाचा आठवावा साक्षेप भूमंडळी,
शिवरायाचे कैसे चालणे, शिवरायाचे कैसे बोलणे
शिवरायाचे सलगी देणे, कैसे असे।

यशवंत, नीतिवंत, सामर्थ्यवंत, वरदवंत
पुण्यवंत, कीर्तिवंत, जाणता राजा श्री

(शिवराज का स्मरो रूप,
शिवराज को स्मरो प्रताप
शिवराज की स्मरो क्षमता, भूमंडल में।
शिवराज कैसे चलते
शिवराज कैसे बोलते
शिवराज का परामर्श देना कैसा है।
यशवंत, नीतिवंत, सामर्थ्यवंत, वरदवंत
पुण्यवंत, कीर्तिवंत, जानकार राजा, श्रीमन्त योगी)

ऐसे छत्रपति शिवाजी महाराज जो स्वयं व्यक्तिगत दृष्टिसे राजा कैसा हो, हिंदुसमाज का व्यक्ति कैसा हो, हिंदुसमाज का नेतृत्व करनेवाला नेता कैसा हो इसका मूर्तिमंत आदर्श आज भी है, जिनके हृदय के आत्मविश्वास और बिजिगीषा ने संपूर्ण समाज के आत्मविश्वास को जागृत किया, संपूर्ण समाज में अपना स्वराज्य स्थापन हो इस आकांक्षा का संकल्प जगाया और उद्यम के साथ समाज को साथ लेकर जिनके नेतृत्व के कारण यह हिंदवी स्वराज्य का सिंहासन निर्मित हुआ उन शिवाजी महाराज की विजय वास्तव में हिंदुराष्ट्र की इस लम्बी लडाई की पहली अवस्था में राष्ट्र कि निर्णायक विजय थी। अगर संघर्ष की दूसरी अवस्था में भी शिवाजी महाराज की नीतिपर चलते तो हम उसी प्रकार की निर्णायक विजय पाते। हम नहीं चले इस लिये हमने पाकिस्तान पाया।

वर्तमान संदर्भ में अनुकरणीय संदेश

आज की परिस्थिति भी वही है। आज की आवश्यकता भी वही है। आज भी समाज के मन में उसी विजिगीषा को, आत्मविश्वास को उद्यम को जागृत करना चाहिये। आज भी प्रत्येक व्यक्ति को शिवाजी महाराज के चरित्र का, गुणों का अनुकरण कर हिंदुसमाज का, हिंदुसमाज के साथ रहकर, अपने लिये नहीं, अपने हिंदूराष्ट्र की सर्वांगणि उन्नति के लिये समाज का सक्षम नेतृत्व करनेवाला व्यक्ति बनना है, और सारे समाज के आत्मविश्वास को एक नई ऊँचाई देनेवाला ऐसा एक हिंदू याने प्रजाहितदक्ष, सहृदयी, सर्वत्र समभावी, नीतिकठोर ऐसा शासन समाज के द्वारा ही स्थापित करवाना है।

आज की परिस्थिति में यह जो उपाय है, वह समाज के संगठन से होनेवाला है। समाज की गुणवत्ता, उद्यम और आत्मविश्वास के आधारपर होने वाला है। इसी प्रकार की भूतपूर्व परिस्थिति में इसका एक जिवंत उदाहरण शिवाजी महाराज के उद्यम में से हमको मिलता है। उस समय के सब लोगों के लिये वह उदाहरण स्वरूप हो गया। सब लोगोंने मिलकर जो प्रयोग किये थे उनकी गलतियाँ सुधारते सुधारते ये अंतिम सफल प्रयोग शिवाजी महाराज का रहा, इस लिये उनके राज्यभिषेक का दिन महत्व का है। हम उनकी जन्मजयंति या पुण्यतिथि को उत्सव के रूप में संघ में नहीं लेते। क्यों कि जन्मते बहुत लोग है, मरते बहुत लोग है, दुनिया में कर क्या गये यह महत्व की बात है।

शिवाजी महाराज के द्वारा संपूर्ण राष्ट्र के लिये किये गये प्रयासों की, यह राज्याभिषेक सफल परिणति है और इसलिये इसको हम शिवसाम्राज्य दिन नहीं कहते। इस को हम कहते है हिंदू साम्राज्य दिवस। और इसीलिये अपने पहले तीन सरसंघचालकों ने कई बार कहा, डाक्टरसाहब तो कहते ही थे, गुरूजी ने कहा है, बालासाहब ने कहा है कि हमारा आदर्श तो तत्व है, भगवा ध्वज है, लेकिन कई बार सामान्य व्यक्ति को निर्गुण निराकार समझ में नहीं आता। उस को सगुण साकार स्वरूप चाहिये और व्यक्ति के रूप में सगुण आदर्श के नाते छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन का प्रत्येक अंश हमारे लिये दिग्दर्शक है। उस चरित्र की, उस नीति की, उस कुशलता की, उस उद्देश्य के पवित्रता की आज आवश्यकता है। इस को समझकर ही अपने संघ ने इस ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को, शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के दिन को हिंदू साम्राज्य दिवस निश्चित किया है। इसीलिये आज की जैसी परिस्थिति में उसी को हम सारे भारत में मानते है। शिवाजी महाराज के कर्तृत्व, उनके गुण, उनके चरित्र के द्वारा मिलनेवाला दिग्दर्शन आज की वैसी ही परिस्थिति में मार्गदर्शक है। आज भी अपने लिये अनुकरणीय है। अपने हिंदू साम्राज्य दिवस के इस महत्व को समझकर हम उसको प्रतिवर्ष मनायें और उस का संदेश स्वयंसेवकों में तो ठीक से जाये ही लेकिन संपूर्ण समाज में इसका संदेश जाये, उनके बुद्धि में जायें, वहाँ से उनके हृदय में उतरे और वहाँ से प्रत्येक व्यक्ति के आचरण में प्रकट हो। संघ का यह उद्यम बढाने के प्रयासों में हम लोग समझ कर सहभागी हो, इतनी बात कहते हुए मैं अपने चार शब्द समाप्त करता हूँ।