वेदांत केसरी स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती: राष्ट्रधर्म, समाजसेवा और महाबलिदान की अमर गाथा
वेदांत केसरी स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती: राष्ट्रधर्म, समाजसेवा और महाबलिदान की अमर गाथा
वेदांत
केसरी स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती: राष्ट्रधर्म, समाजसेवा और महाबलिदान की अमर गाथा
भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म और असहाय वनवासी समाज के
सर्वांगीण उत्थान के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने वाले 'वेदांत केसरी' पूज्य
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी का जीवन त्याग, तपस्या, सेवा और शौर्य की एक अलौकिक
तथा जाज्वल्यमान ज्वाला था। ओडिशा के अत्यंत दुर्गम, घने जंगलों से घिरे और अति पिछड़े
कंधमाल (फूलबनी) जिले के गुरजंग गांव में वर्ष 1924 में जन्मे स्वामी जी के मन में
बाल्यकाल से ही राष्ट्र, संस्कृति और समाज के प्रति गहरी निष्ठा तथा सेवा की तीव्र
उत्कंठा थी। गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को पूर्ण करने के पश्चात, समाज कल्याण और
राष्ट्र रक्षा के उच्च ध्येय से प्रेरित होकर उन्होंने अपनी आत्मिक शक्ति और साधना
को निखारने के लिए हिमालय का मार्ग चुना।
वर्ष 1965 में हिमालय की कठोर साधना से लौटने के उपरांत
स्वामी जी ने स्वयं को पूरी तरह राष्ट्रहित के कार्यों में झोंक दिया। सर्वप्रथम वे
देशव्यापी गोरक्षा आंदोलन से जुड़े और गोवंश की रक्षा के लिए जनजागरण अभियान चलाया।
इसके बाद उन्होंने ओडिशा के सुदूर और वनवासी बहुल कंधमाल जिले के चकपाद गांव को अपना
मुख्य कार्यक्षेत्र बनाया। लगभग चार दशकों से भी अधिक समय तक उन्होंने अत्यंत विपरीत
परिस्थितियों में रहकर वनवासी बंधुओं के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक विकास
के लिए दूरगामी तथा ऐतिहासिक कार्य किए।
स्वामी जी केवल एक आध्यात्मिक संत ही नहीं थे, बल्कि
वे एक महान समाज सुधारक, दूरदर्शी शिक्षाविद और कुशल संगठनकर्ता भी थे। संस्कृत व्याकरण
और वेदांत दर्शन में उनके असाधारण और अगाध पांडित्य के कारण ही विद्वत समाज द्वारा
उन्हें 'वेदांत केसरी' की सम्मानित उपाधि से विभूषित किया गया था। उनका दृढ़ विश्वास
था कि शिक्षा के बिना समाज का वास्तविक उत्थान संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने कंधमाल
के अत्यंत दुर्गम क्षेत्र चकपाद में गुरुकुल पद्धति पर आधारित एक संस्कृत विद्यालय
एवं महाविद्यालय की स्थापना की।
इसके साथ ही वनवासी बालिकाओं की शिक्षा और संस्कार के
लिए उन्होंने वर्ष 1988 में जलेस्पट्टा में 'शंकराचार्य कन्याश्रम' नामक एक पूर्ण आवासीय
विद्यालय और आश्रम की शुरुआत की। इस आश्रम ने हजारों आदिवासी बालिकाओं को शिक्षित और
आत्मनिर्भर बनाकर उनके जीवन को नई दिशा दी। इसके अतिरिक्त उन्होंने अंगुल और कटक जिलों
में भी विभिन्न विद्यालयों और आश्रमों की स्थापना की।
शिक्षा के साथ-साथ स्वामी जी ने स्थानीय ग्रामीण और
वनवासी आबादी को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए अभूतपूर्व कार्य किए। उन्होंने कक्षाओं
में छात्रों को व्याकरण सिखाया तो वहीं खेतों में जाकर ग्रामीणों को उन्नत कृषि तकनीकों
का व्यावहारिक ज्ञान दिया। उन्होंने लोगों को धान और सब्जियों की वैज्ञानिक खेती करना
सिखाया। उनके सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप उदयगिरि और रायकिया ब्लॉक क्षेत्र के किसान
उत्कृष्ट गुणवत्ता वाली बीन्स (सेम) का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने लगे। उन्होंने
कटिंगिया में एक सब्जी सहकारी समिति का गठन किया, जिससे बिचौलियों का शोषण समाप्त हुआ
और स्थानीय आदिवासियों की आर्थिक स्थिति में क्रांतिकारी सुधार आया।
पर्यावरण और प्रकृति संरक्षण के प्रति स्वामी जी की
दूरदृष्टि अद्भुत थी। उन्होंने आदिवासियों को समझाया कि पहाड़ और जंगल समाज की धरोहर
हैं। उन्होंने गांव-गांव में मठ स्थापित किए और नियम बनाया कि कोई भी व्यक्ति बिना
ग्राम समिति की पूर्व अनुमति के वृक्ष नहीं काटेगा। जिस 'संयुक्त वन प्रबंधन प्रणाली'
को सरकार ने कई दशकों बाद लागू किया, स्वामी जी ने उसे 1970 के दशक में ही कंधमाल के
जंगलों में सफलतापूर्वक लागू कर दिखाया था। वनवासी समाज को उनकी मूल जड़ों, परंपराओं
और गौरवशाली सनातन धर्म से जोड़े रखना स्वामी जी का प्रमुख लक्ष्य था। उन्होंने कई
प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया, जिनमें चकपाद का प्रसिद्ध बिरूपाक्ष्य
मंदिर, कुमारेश्वर और जोगेश्वर मंदिर शामिल हैं। उन्होंने स्थान-स्थान पर वनवासी देव
स्थलों (धर्माणीपेनू) की पुनर्स्थापना की।
वर्ष 1986 में स्वामी जी ने जगन्नाथपुरी से भगवान जगन्नाथ
जी के दिव्य रथ के साथ ओडिशा के अत्यंत दुर्गम वनवासी जिलों में लगभग तीन महीने लंबी
ऐतिहासिक रथयात्रा निकाली। इस यात्रा के दौरान लगभग 10 लाख वनवासी पुरुषों और महिलाओं
ने भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए, जिससे उनमें अपनी संस्कृति और धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा
और स्वाभिमान का जागरण हुआ। इस रथयात्रा के माध्यम से स्वामी जी ने नशाबंदी, सामाजिक
कुरीतियों के उन्मूलन और गोरक्षा का संदेश दिया। उनके इस विशाल और ऐतिहासिक सांस्कृतिक
पुनर्जागरण कार्य से प्रसन्न होकर पुरी की गोवर्धन पीठ के पूज्य शंकराचार्य जी ने उन्हें
"विधर्मी कुचक्र विदारण महारथी" की उपाधि से अलंकृत किया।
ईसाई
मिशनरियों द्वारा छल, प्रलोभन और धोखे से किए जा रहे अवैध धर्मांतरण को रोकना, गोहत्या
पर पूर्ण विराम लगाना और मिशनरियों के भूमि-कब्जे के षड्यंत्रों को उजागर करना स्वामी
जी के जीवन का मुख्य ध्येय बन गया था। उनके इन राष्ट्रभक्तिपूर्ण और धर्मरक्षक कार्यों
से धर्मांतरणकारी शक्तियां पूरी तरह बौखला गई थीं। स्वामी जी पर वर्ष 1970 से 2007
के बीच 8 बार प्राणघातक और हिंसक हमले किए गए। लेकिन हर हमले के बाद उनका संकल्प और
अधिक मजबूत होता गया। वे प्रायः कहा करते थे कि राष्ट्र और धर्म के इस दिव्य कार्य
में कोई भी बाधा उनके कदम नहीं रोक सकती।
अंततः 23 अगस्त 2008 को, श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पावन
संध्या पर, जब 84 वर्षीय स्वामी जी जलेस्पट्टा कन्याश्रम में संध्या प्रार्थना के पश्चात
अपने शिष्याओं और सहयोगियों से चर्चा कर रहे थे, तब AK-47 और आधुनिक हथियारों से लैस
उग्रवादियों ने आश्रम में बलपूर्वक प्रवेश किया। हमलावरों ने अत्यंत बर्बरता और नृशंसतापूर्वक
स्वामी जी, माता भक्तिमयी, बाबा अमृतानंद, किशोर बाबा और पुरुब गंथी की गोली मारकर
हत्या कर दी।
धर्म, संस्कृति और वनवासी समाज की रक्षा करते हुए स्वामी
जी ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी का यह सर्वोच्च
बलिदान केवल एक संत का अंत नहीं था, बल्कि वह भारत की सनातन परंपरा, वनवासी स्वाभिमान
और राष्ट्ररक्षा का एक अमर अध्याय बन गया, जो युगों-युगों तक देशवासियों को प्रेरित
करता रहेगा।
अमोल
तपासे, नागपूर



