नागपुर संस्करण
व्यक्तित्व

अर्पण - तर्पण

अमृतस्य पुत्राः - श्रद्धेय राष्ट्रयोगी दत्तोपंत ठेंगड़ी

📅 7 अक्टू॰ 2026 ✍️ Shri Amol Tapase 👁 41 बार देखा
अर्पण - तर्पण
अर्पण - तर्पण
अमृतस्य पुत्राः - श्रद्धेय राष्ट्रयोगी दत्तोपंत ठेंगड़ी
पितृपक्ष के इस पावन और पवित्र पर्व पर, राष्ट्र व समाज के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने वाले, श्रद्धेय विचारक, 'भारतीय मजदूर संघ' व 'स्वदेशी जागरण मंच' जैसी राष्ट्रव्यापी संस्थाओं के प्रणेते राष्ट्रयोगी श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी की पावन और पवित्र स्मृति को शत-शत नमन करते हुए हृदय श्रद्धा और कृतज्ञता से भर आता है।
दीपावली के आलोकित पर्व पर, 10 अक्टूबर 1920 को वर्धा जिले की आर्वी पावन भूमि पर जन्मे दत्तोपंत जी बचपन से ही स्वतंत्रता संग्राम में सतत और सक्रिय रहे। वर्ष 1935 में, वयाच्या मात्र पंद्रहवें वर्ष में, वे 'वानरसेना' के आर्वी तालुका अध्यक्ष बने। डॉक्टर हेडगेवार के सान्निध्य में आने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रभक्ति के विचार उनके मन और बुद्धि पर अचल रूप से अंकित हो गए। उनके पिता उन्हें विधिज्ञ (वकील) बनाना चाहते थे; परंतु उन्होंने एम.ए. और कानून की शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात, 1941 में अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रकार्य के लिए अर्पण कर पूर्णकालिक 'प्रचारक' के रूप में जीवनव्रत स्वीकार किया।
प्रारंभ में उन्हें केरल भेजा गया। वहां उन्होंने 'राष्ट्रभाषा प्रचार समिति' के कार्य को अपनी साधना से सींचा। केरल के पश्चात उन्होंने बंगाल और असम में भी संघकार्य का विस्तार किया। संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी की आज्ञा से उन्होंने अत्यंत चुनौतीपूर्ण और उपेक्षित ऐसे श्रमिक क्षेत्र में कदम रखा। इसके लिए उन्होंने 'इंटक' और 'शेतकरी कामगार फेडरेशन' जैसी संस्थाओं में प्रत्यक्ष कार्य कर मजदूर आंदोलन की खुरदुरी हकीकत को आत्मसात किया। साम्यवादी विचारों के खोखलेपन से वे लाखों श्रमिकों को भली-भांति अवगत कराते थे। इसी वैचारिक मंथन से उन्होंने 'भारतीय मजदूर संघ' नामक पूरी तरह अराजनीतिक और राष्ट्रवादी मजदूर संगठन की नींव रखी, जो आज देश के सबसे बड़े श्रमिक संगठन के रूप में डान के साथ खड़ा है।
उनके इन राष्ट्रनिष्ठ विचारों ने श्रमिक और उद्योग जगत में एक नए युग का सूत्रपात किया। कम्युनिस्ट विचारों के विखंडित और नकारात्मक नारों के स्थान पर— "चाहे जो मजबूरी हो, मांग हमारी पूरी हो..." या "दुनिया के मजदूरो एक हो..."—भारतीय मजदूर संघ ने अत्यंत उदात्त और सात्विक जीवनमूल्यों का संदेश दिया:
"देश के हित में करेंगे काम, काम के लेंगे पूरे दाम; मजदूरों दुनिया को एक करो, कमाने वाला खिलायेगा।"
इस एक ही विचार ने संपूर्ण श्रमिक जगत का चित्र बदल दिया। केवल स्वार्थ और तनाव उत्पन्न करने के स्थान पर राष्ट्रहित और श्रमप्रतिष्ठा कामगारों की पहचान बन गई। उनके ही अथक प्रयासों से भारत में 'मई दिवस' के स्थान पर 17 सितंबर का दिन 'विश्वकर्मा जयंती' के रूप में 'श्रमिक दिवस' के तौर पर संपूर्ण देश में अत्यंत आदर के साथ मनाया जाने लगा।
वर्ष 1951 से 1953 के कालखंड में उन्होंने मध्य प्रदेश में 'भारतीय जनसंघ' के संगठन मंत्री के रूप में दायित्व निभाया; परंतु मजदूर क्षेत्र में राष्ट्रकार्य का व्यासंग बढ़ने के पश्चात उन्होंने राजनीति का मार्ग पूरी तरह छोड़कर अपना संपूर्ण जीवन केवल श्रमिकों के कल्याण और राष्ट्र-निर्माण के लिए समर्पित कर दिया। 1964 से 1976 तक वे दो बार राज्यसभा के सम्मानित सदस्य रहे। उन्होंने विश्व के अनेक देशों की यात्राएं कीं। प्रत्येक देश में न केवल मजदूर आंदोलन का अध्ययन किया, बल्कि वहां की सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति का भी गहन विश्लेषण किया। उनके इस प्रगाढ़ अध्ययन के कारण चीन और रूस जैसे कम्युनिस्ट देश भी श्रमिक समस्याओं पर उनसे बहुमूल्य परामर्श एवं मार्गदर्शन लेते थे। इसके अतिरिक्त, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय किसान संघ, सामाजिक समरसता मंच जैसी राष्ट्र-निर्माण की विभिन्न दिशाओं को खोलने वाली संस्थाओं की स्थापना में उनकी अत्यंत महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक भूमिका रही।
26 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू होने पर, दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने भूमिगत रहकर 'लोक संघर्ष समिति' के सचिव के रूप में कांग्रेस और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तानाशाही के विरुद्ध हुए स्वतंत्रता आंदोलन का अत्यंत साहस के साथ संचालन किया। 1977 में जनता पार्टी की सत्ता आने पर जब अन्य नेता सत्ता और पदों की लालसा के लिए आपस में लड़ रहे थे, तब ठेंगड़ी जी ने सत्ता को ठुकराकर केवल और केवल मजदूर क्षेत्र में ही कार्य करना अधिक पसंद किया।
उनकी इस निस्पृह राष्ट्रसेवा के सम्मान स्वरूप 2002 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) शासन द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित 'पद्मभूषण' अलंकरण की घोषणा की गई; किंतु उन्होंने इसे अत्यंत आदरपूर्वक और स्पष्ट भूमिका के साथ अस्वीकार कर दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि, "जब तक संघ के संस्थापक पूज्य डॉ. हेडगेवार जी और श्री गुरुजी को देश का सर्वोच्च 'भारत रत्न' सम्मान नहीं मिलता, तब तक मैं कोई भी शासकीय अलंकरण स्वीकार नहीं करूंगा।" उनके इस अतुलनीय समर्पण के आगे पूरा देश नतमस्तक हो गया। मजदूर संघ में उनकी असीम लोकप्रियता और सफलता देखकर जब कभी कार्यकर्ता उनकी जय-जयकार के नारे लगाने लगते, तब उन्होंने अत्यंत विनीत भाव से एक कड़क नियम बनाया कि, "कार्यक्रमों में किसी भी व्यक्ति की जय-जयकार न होकर, केवल 'भारत माता की जय' और 'भारतीय मजदूर संघ की जय' के ही नारे लगाए जाएं।"
ऐसे युगांतकारी और ऋषितुल्य नेता 14 अक्टूबर 2004 को अनंत में विलीन हो गए। श्री ठेंगड़ी अनेक भाषाओं के प्रकांड पंडित और अष्टपैलू लेखक थे। उन्होंने हिंदी में 28, अंग्रेजी में 12 और मराठी में 3 ग्रंथों की रचना कर वैचारिक संपदा को समृद्ध किया। उनमें 'लक्ष्य और कार्य', 'एकात्म मानवदर्शन', 'ध्येयपथ', 'बाबासाहब भीमराव आंबेडकर', 'सप्तक्रम', 'हमारा अधिष्ठान', 'राष्ट्रीय श्रम दिवस', 'कम्युनिज्म अपनी ही कसौटी पर', 'संकेत रेखा', 'राष्ट्र', 'थर्ड वे' आदि ग्रंथ आज भी हमारे लिए मार्गदर्शक दीपस्तंभ हैं।
ऐसे महान द्रष्टा राष्ट्रपुरुष, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र और श्रमिकों के चरणों में अर्पित कर दिया, उनकी पावन स्मृति को हम परिवार एवं समाज की ओर से अत्यंत भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनकी शिक्षाएं और विचार हमारे हृदय में सदैव अमर रहें, यही ईश्वर से प्रार्थना है!
ॐ शांति! शत-शत श्रद्धांजलि!
अमोल तपासे,नागपूर
९९६०६७३७८९

संबंधित लेख