नागपुर संस्करण
व्यक्तित्व

॥ अर्पण - तर्पण ॥

त्याग, तपस्या, समाजसेवा और ग्रामोदय के अमर प्रतीक, 'भारत रत्न' श्रद्धेय नानाजी देशमुख (चंडिकादास अमृतराव देशमुख) जी

📅 7 अक्टू॰ 2026 ✍️ Shri Amol Tapase 👁 50 बार देखा
॥ अर्पण - तर्पण ॥
॥ अर्पण - तर्पण ॥
त्याग, तपस्या, समाजसेवा और ग्रामोदय के अमर प्रतीक, 'भारत रत्न' श्रद्धेय नानाजी देशमुख (चंडिकादास अमृतराव देशमुख) जी के दिव्य चरणों में इस पावन पितृपक्ष पर हम कोटि-कोटि नमन एवं भावपूर्ण शब्द-सुमन तर्पण अर्पित करते हैं।
​११ अक्टूबर १९१६ को महाराष्ट्र के परभणी जिले की पावन धरा पर जन्मे नानाजी का संपूर्ण जीवन राष्ट्र-सेवा, स्वावलंबन और समर्पण की अमर गाथा है। अपनी शिक्षा के लिए संघातिक आर्थिक कठिनाइयों से जूझते हुए, सब्जी तक बेचने वाले उस निश्छल बालक ने लोकमान्य तिलक के प्रखर राष्ट्रवादी विचारों और डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के पावन मार्गदर्शन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र की बलिवेदी पर स्वयं को समर्पित कर दिया।
​१९४० से आजीवन प्रचारक के रूप में राष्ट्र सेवा का व्रत धारण कर उत्तर प्रदेश में संगठन की नींव मजबूत करने से लेकर, १९५० में गोरखपुर में देश के प्रथम 'सरस्वती शिशु मंदिर' की स्थापना तक—शिक्षा और संस्कार के क्षेत्र में उनका योगदान युगों-युगों तक स्मरणीय रहेगा। "राष्ट्रधर्म", "पांचजन्य" और "स्वदेश" जैसे राष्ट्रवादी पत्रों के माध्यम से उन्होंने आर्थिक अभावों के बीच भी निर्भीक पत्रकारिता और विचारों का बीजारोपण किया।
​विनोबा भावे जी के 'भूदान आंदोलन' से लेकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के 'संपूर्ण क्रांति' आंदोलन तक, वे हमेशा परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे। १९७७ में जनता पार्टी के मुख्य वास्तुकार के रूप में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से सांसद चुने जाने के उपरांत, जब सत्ता और मंत्री पद उनके चरणों में थे—तब उन्होंने सहजता से यह सिद्ध कर दिया कि राजनीति उनके लिए कोई पेशा नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा का एक पवित्र मिशन है। जेपी की उपस्थिति में राजनीति से संन्यास की घोषणा कर उन्होंने निःस्वार्थ सेवा का एक नया इतिहास रचा।
​दीनदयाल शोध संस्थान (१९६८) की स्थापना तथा देश के प्रथम 'चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय' के कुलाधिपति के रूप में उन्होंने "ग्रामोदय से भारत उदय" और "स्वावलंबन" की जो अलख जगाई, वह आज भी आत्मनिर्भर भारत का मार्ग प्रशस्त कर रही है। ग्रामीण गरीबों के उत्थान और आत्मसम्मान के लिए उनका समर्पित चिंतन अनुकरणीय है।
​राष्ट्र के प्रति उनके इस अप्रतिम और अतुलनीय अवदान हेतु उन्हें पद्म विभूषण, राज्यसभा सदस्यता तथा मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' (२०१९) से अलंकृत किया गया।
​चित्रकूट की तपोभूमि में वर्ष २०१० में भले ही वे भौतिक रूप से हमसे विदा हो गए, परंतु उनकी अमर दृष्टि, विचार और अंत्योदय का संकल्प आज भी हज़ारों युवाओं के हृदय में धधक रहा है।
​इस पवित्र पितृपक्ष में, ऐसे निष्काम कर्मयोगी, मां भारती के सच्चे सपूत और राष्ट्रऋषि के पावन चरणों में हम अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण कर अश्रुपूर्ण एवं भावपूर्ण तर्पण अर्पित करते हैं।
​॥ ॐ शांति: शांति: शांति: ॥
॥ अमर रहे नानाजी का राष्ट्र-समर्पण ॥
अमोल तपासे, नागपूर
९९६०६७३७८९

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