॥ अर्पण - तर्पण ॥
श्री दिगंबर विश्वनाथ (राजाभाऊ) पातुरकर: राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित एक ऋषितुल्य प्रचारक का पुण्यस्मरण
॥ अर्पण - तर्पण ॥
श्री दिगंबर विश्वनाथ (राजाभाऊ) पातुरकर: राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित एक ऋषितुल्य प्रचारक का पुण्यस्मरण
पितृपक्ष में हम अपने पूर्वजों और जिनके ऋण के तले हम जीवन जी रहे हैं, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। परंतु, केवल अपने कुल के पूर्वजों का ही नहीं, बल्कि जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र, धर्म और समाज की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया, ऐसे 'राष्ट्रपितरों' का स्मरण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करना हमारा परम कर्तव्य है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शुरुआती दौर का एक अनमोल रत्न थे श्री दिगंबर विश्वनाथ उर्फ राजाभाऊ पातुरकर।
राजाभाऊ का जन्म १९१५ में नागपुर में हुआ था। सीताबर्डी स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान ही उन्हें बापूराव वराडपांडे और भाऊराव देवरस जैसे समर्पित निष्ठावानों का साथ मिला। इसी माध्यम से उन्हें परम पूजनीय डॉ. हेडगेवार जी का मार्गदर्शन और संघ के संस्कार प्राप्त हुए। नागपुर में प्रज्वलित हुई देशभक्ति की यह लौ आगे भी अखंड जलती रही।
मैट्रिक उत्तीर्ण होते ही डॉ. हेडगेवार जी के निर्देशानुसार राजाभाऊ पंजाब की राजधानी लाहौर के लिए रवाना हो गए। उच्च शिक्षा ग्रहण करने के साथ-साथ वहाँ संघ कार्य खड़ा करना उनके समक्ष मुख्य ध्येय था। अनजान प्रांत में, अपरिचित लोगों के बीच शाखा शुरू करना आसान नहीं था। शुरुआत में संघ शाखा में कोई नहीं आता था; परंतु राजाभाऊ विचलित नहीं हुए। 'शाखा में कोई हो या न हो, राष्ट्र प्रार्थना होनी ही चाहिए' की ज़िद के साथ वे अकेले ही मैदान में खड़े होकर प्रार्थना गाते थे।
उनके धैर्य और पराक्रम का सच्चा परिचय तब मिला, जब कुछ मुस्लिम गुंडों ने हिंदू छात्रों पर हमला कर दिया। राजाभाऊ ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर उन गुंडों का ऐसा कड़ा मुकाबला किया कि हर तरफ उनके पराक्रम का डंका बज गया। इस घटना के बाद हिंदू छात्रों के मन में विश्वास जगा और लाहौर की शाखा में युवाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी। उन्होंने पंजाब की भाषा सीखी, घर-घर जाकर सैकड़ों परिवारों से आत्मीय संबंध जोड़े और पूरे पंजाब में संघ का एक विशाल नेटवर्क स्थापित कर दिया।
राजाभाऊ का योगदान केवल संघ कार्य तक सीमित नहीं था, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक रोमांचक अध्याय से भी उनका गहरा संबंध था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जब अंग्रेजों की कैद से छूटकर भूमिगत होने का मार्ग चुना और वेष बदलकर सीमा पार करने की योजना बनाई, तब लाहौर में भाऊराव देवरस और बापूराव मोघे के साथ मिलकर राजाभाऊ पातुरकर ने नेताजी को सीमा पार कराने में अत्यंत साहसी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
स्वतंत्रता के बाद १९४८ में जब संघ पर अन्यायपूर्ण प्रतिबंध लगाया गया, तब राजाभाऊ ने भूमिगत रहकर सत्याग्रह का अत्यंत कुशलतापूर्वक नेतृत्व किया। प्रतिबंध हटने के बाद १९५२ से १९५७ के दौरान उन्होंने मध्य भारत प्रांत के 'प्रांत प्रचारक' के रूप में जिम्मेदारी संभाली। आगे चलकर परम पूजनीय बालासाहेब देवरस की प्रेरणा से उन्होंने 'भारती मंगलम्' नामक संस्था की स्थापना की। युवा पीढ़ी को भारत के महान पुरुषों के जीवन चरित्र से परिचित कराना और उनमें राष्ट्रीय अस्मिता को जगाना ही इसका मुख्य उद्देश्य था।
२ जनवरी १९८८ को नागपुर में इस महान देशभक्त की जीवन ज्योति शांत हो गई।
राजाभाऊ का जीवन निष्ठा, साहस, संगठन कौशल और निःस्वार्थ सेवा का एक प्रेरणादायी उदाहरण है। इस पितृपक्ष में, जिन महापुरुषों ने अपने घर-परिवार को न्योछावर कर 'राष्ट्राय स्वाहा, इदं न मम' (सब कुछ राष्ट्र के लिए समर्पित है, मेरा कुछ नहीं) की भावना से देश का निर्माण किया, उन राजाभाऊ पातुरकर की पवित्र स्मृति को भावपूर्ण श्रद्धांजलि एवं मन से कृतज्ञता!
अमोल तपासे, नागपूर
९९६०६७३७८९




