नागपुर संस्करण
व्यक्तित्व

॥ अर्पण - तर्पण ॥

त्याग और साधना के प्रतीक: श्रध्देय भाऊराव देवरस जी

📅 29 सित॰ 2026 ✍️ Shri Amol Tapase 👁 31 बार देखा
॥ अर्पण - तर्पण ॥
॥ अर्पण - तर्पण ॥
त्याग और साधना के प्रतीक: श्रध्देय भाऊराव देवरस जी 
पितृपक्ष के पावन एवं पुनीत अवसर पर, परम श्रद्धेय श्री मुरलीधर दत्तात्रेय (भाऊराव) देवरस जी के चरणों में समर्पित भावपूर्ण तर्पण एवं आदरणांजलि
भारतीय संस्कृति में पितृपक्ष केवल पूर्वजों के स्मरण का पर्व नहीं, बल्कि उन महान चेतनाओं, राष्ट्र-नायकों और पूज्य महर्षियों के प्रति परम कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन अवसर है, जिन्होंने अपने तप और त्याग से समाज तथा राष्ट्र के जीवन को आलोकित किया। उत्तर प्रदेश की पावन धरा पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार-बीज को रोपित कर उसे एक विशाल, छायादार वटवृक्ष का रूप देने वाले, सादगी और निस्वार्थ कर्मयोग के अनुपम प्रतीक, परम श्रद्धेय श्री मुरलीधर दत्तात्रेय (भाऊराव) देवरस जी के चरणों में इस पितृपक्ष पर हम कोटि-कोटि नमन करते हैं और श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
19 नवम्बर 1917 (देवोत्थान एकादशी) को नागपुर की पवित्र भूमि पर जन्म लेने वाले भाऊराव जी बचपन से ही पूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के सानिध्य में ढले। अपने ज्येष्ठ भ्राता और संघ के तृतीय सरसंघचालक पूज्य बालासाहब देवरस जी के साथ 'बाल-भाऊ' की जोड़ी के रूप में उन्होंने संघ-संस्कारों को अपनी आत्मा में बसाया। मेधा इतनी असाधारण कि लखनऊ विश्वविद्यालय से बी.कॉम और एल.एल.बी. जैसी दोहरी स्नातकोत्तर डिग्री में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। वे चाहते तो किसी भी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बनकर एक अत्यंत सुखद, सुरक्षित और प्रतिष्ठित जीवन व्यतीत कर सकते थे, परंतु उनके मन में तो केवल माँ भारती के वैभव को पुनर्स्थापित करने की अखंड ज्वाला जल रही थी। पूज्य डॉक्टर जी के एक आह्वान पर उन्होंने व्यक्तिगत जीवन की समस्त अभिलाषाओं का हंसते-हंसते परित्याग कर दिया और उत्तर प्रदेश को अपनी साधना की कर्मभूमि बना लिया।
भाऊराव जी का शुरुआती जीवन अत्यंत कठोर संघर्षों और अभावों की महागाथा है। जब परिवार का आर्थिक सहयोग बंद हो गया, तब स्वाभिमान और साधना की मिसाल पेश करते हुए उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर और एक समय का भोजन करके संघ-कार्य के विस्तार का संकल्प जारी रखा। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के क्षितिज से लेकर लखनऊ की गलियों तक, वे छात्रों के बीच जाते, उनसे आत्मीय संबंध बनाते और उनमें राष्ट्र-भक्ति की अलख जगाते। उनकी अद्भुत पारखी दृष्टि ने अनगिनत हीरों को पहचाना। पंडित दीनदयाल उपाध्याय, श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी और परम पूज्य रज्जू भैया जैसे युगपुरुषों को तराशने और राष्ट्र-सेवा के मार्ग पर अग्रसर करने वाले शिल्पी भाऊराव देवरस जी ही थे।
केवल संगठन विस्तार ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की वैचारिक और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने में भी उनका योगदान अतुलनीय है। 1947 में लखनऊ से 'राष्ट्रधर्म प्रकाशन' की स्थापना कर उन्होंने 'राष्ट्रधर्म', 'पाँचजन्य' और 'तरुण भारत' जैसे पत्रों का बीजारोपण किया, जो आज भी भारत की वैचारिक दिशा के सशक्त स्तंभ हैं। 1952 में गोरखपुर से 'सरस्वती शिशु मंदिर' के माध्यम से जो शिक्षा-बीज उन्होंने बोया था, वही आज 'विद्या भारती' के रूप में 50,000 से अधिक विद्यालयों का विशाल वटवृक्ष बन चुका है, जो देश भर में लाखों बालकों को उच्च शिक्षा के साथ-साथ देशभक्ति और धर्म के संस्कारों से सिंचित कर रहा है।
उत्तर प्रदेश के पश्चात बिहार, बंगाल, पूर्वोत्तर भारत से लेकर दिल्ली केंद्र तक, संघ के सह सरकार्यवाह और विभिन्न महत्त्वपूर्ण दायित्वों को निभाते हुए उन्होंने देश के कोने-कोने में अथक प्रवास किया। जीवन के अंतिम क्षणों तक, जर्जर होते शरीर के बावजूद, उनकी मानसिक जागरूकता और राष्ट्र-चिंता अखंड बनी रही। 13 मई 1992 को वे गोलोकवासी हुए, किंतु उनकी साधना का प्रकाश आज भी अमर है।
हे राष्ट्र-ऋषि! हे परम तपस्वी भाऊराव जी! आपका जीवन केवल एक इतिहास नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवित प्रेरणा-पुंज है। आपकी अविश्रांत साधना, अगाध वात्सल्य और असाधारण दृष्टि के बल पर ही आज लाखों स्वयंसेवक देश के हर क्षेत्र में सर्वोच्च स्थानों पर आसीन होकर भारत माता की सेवा कर रहे हैं।
पितृपक्ष के इस पावन अवसर पर, हम आपके श्रीचरणों में कृतज्ञता का यह तर्पण-अर्घ्य अर्पित करते हैं। आपके द्वारा दिखाए गए राष्ट्र-पुनर्निर्माण, निःस्वार्थ सेवा और त्याग के अमर मार्ग पर हम सब सदैव निष्ठापूर्वक अग्रसर रहें—यही आपके पावन चरणों में हमारी सबसे सच्ची, प्रामाणिक और भावपूर्ण श्रद्धांजलि है।
॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥
 अमोल तपासे, नागपूर 
९९६०६७३७८९

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