॥ अर्पण - तर्पण ॥
श्रध्देय यादवराव जोशी: राष्ट्रसेवा की अमर साधना और त्याग की एक अमिट गाथा
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श्रध्देय यादवराव जोशी: राष्ट्रसेवा की अमर साधना और त्याग की एक अमिट गाथा
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जीवन किसी साधारण इतिहास के पृष्ठों पर नहीं, बल्कि समाज के हृदय पर अंकित होता है। श्रद्धेय यादवराव जोशी जी एक ऐसा ही देदीप्यमान नक्षत्र थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन माँ भारती के चरणों में समर्पित कर दिया। नागपुर की पवित्र धरा पर ३ सितंबर १९१४ को एक वेदपाठी परंपरा से समृद्ध परिवार में जन्मे यादवराव जी ने शिक्षा के क्षेत्र में उच्च शिखर छूते हुए एम.ए. और कानून की उपाधि प्राप्त की। किंतु, जब राष्ट्रीय पुनरुत्थान का आह्वान हुआ, तो उन्होंने अपनी सभी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को तिलांजलि देकर स्वयं को एक निष्काम प्रचारक के रूप में देश सेवा में होम कर दिया।
दक्षिण भारत को अपना कर्मक्षेत्र बनाते हुए जब वे कर्नाटक पहुँचे, तो कन्नड़ भाषा उनके लिए सर्वथा अनजानी थी। किंतु जहाँ समर्पण का भाव निष्कलंक हो, वहाँ भाषा कभी बाधा नहीं बनती। अपनी आत्मीयता, अडिग सेवाभाव और प्रेम से उन्होंने कन्नड़ भाषियों के दिलों में वह गहरा स्थान बनाया, जो इतिहास में विरले ही देखने को मिलता है। उनकी कालजयी प्रेरणा से बेंगलुरु में 'राष्ट्रोत्थान परिषद' की स्थापना हुई, जो आज शहर का सबसे विशाल ब्लड बैंक चलाने के साथ-साथ झुग्गी-झोपड़ियों के वंचित बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देकर उनके भविष्य को नई दिशा दे रही है। केरल की पावन भूमि पर बाल मन को अपनी मूल सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए उन्होंने 'बालगोकुलम' की शुरुआत की, जो आज एक वटवृक्ष बन चुका है। इसके साथ ही उन्होंने 'हिंदू सेवा प्रतिष्ठान' की स्थापना की, जिसने ५,००० से अधिक समर्पित युवाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें तीन वर्षों के लिए ग्रामीण भारत के कोने-कोने में निस्वार्थ सेवा के लिए भेजा।
कम ही लोग जानते हैं कि यादवराव जी की कण्ठ-प्रतिभा इतनी अलौकिक थी कि स्वयं भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी जैसे संगीत मार्तंड भी उनके गायन का लोहा मानते थे। 'बाल भास्कर' के रूप में प्रसिद्ध इस तेजस्वी युवा ने जब संघ-कार्य का प्रण लिया, तो संगीत जैसी प्रिय कला का भी मोह त्याग दिया। संघ की अमर प्रार्थना 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे' को अपनी ओजस्वी और सुमधुर आवाज़ में पहली बार गाने का सौभाग्य भी यादवराव जोशी जी को ही मिला था।
जीवन के संघर्षों ने उनके संकल्प को कभी झुकने नहीं दिया। चाहे वह महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगा अनुचित आरोप हो, या १९७५ का काला दौर—दोनों बार संघ पर प्रतिबंध के समय वे जेल गए और प्रताड़ना सही, किंतु जब-जब बाहर आए, दुगुनी ऊर्जा, अदम्य उत्साह और अटूट निष्ठा के साथ पुनः राष्ट्रकार्य में जुट गए। सादगी, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा की प्रतिमूर्ति यादवराव जी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पहला अनौपचारिक 'अखिल भारतीय सेवाप्रमुख' माना जाता है। १९९२ में जब उन्होंने अपनी अंतिम साँस ली, तो पीछे छोड़ गए निष्काम सेवा की एक ऐसी प्रज्वलित ज्योति, जो आने वाली पीढ़ियों का मार्ग सदैव प्रशस्त करती रहेगी।
अमोल तपासे,नागपूर
९९६०६७३७८९




