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गरबा- एक सांस्कृतिक धरोहर - श्रीमती कांचन त्रिपाठी

📅 14 Oct 2026 ✍️ Admin Editor 👁 84 views
गरबा- एक सांस्कृतिक धरोहर - श्रीमती कांचन त्रिपाठी
*नवरात्रि विशेष*
गरबा, मनोरंजन का साधन नहीं, सनातन शक्ति की साधना का लोक पर्व 

नवरात्रि केवल उत्सव के नौ दिन नहीं, बल्कि शक्ति की आराधना, आत्मजागरण और भारतीय संस्कृति के गौरव को अनुभव करने का पर्व है। इन नौ दिनों में माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। घर-घर दीप प्रज्वलित होते हैं, मंदिरों में आराधना होती है और समाज में उत्साह का वातावरण बनता है। इसी परंपरा का एक सुंदर लोक रूप है—गरबा।

गरबा हमारी लोकसंस्कृति की ऐसी परंपरा है, जिसमें भक्ति, संगीत, नृत्य और सामूहिकता का अद्भुत संगम दिखाई देता है। दीप या गरबी को केंद्र में रखकर उसके चारों ओर घूमना केवल नृत्य की एक शैली नहीं, बल्कि जीवन के केंद्र में शक्ति और प्रकाश को स्थापित करने का प्रतीक माना जाता है। हमारे पूर्वजों ने उत्सव के माध्यम से भी जीवन-मूल्यों और आध्यात्मिक भावनाओं को समाज तक पहुँचाया।

लेकिन आज हमें स्वयं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछना होगा—क्या गरबा अपने मूल उद्देश्य के साथ आगे बढ़ रहा है?

आज अनेक स्थानों पर गरबा एक धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सव से अधिक एक ग्लैमरस इवेंट का रूप लेता दिखाई देता है। महंगे परिधान, आकर्षक मेकअप, बड़े-बड़े आयोजन, प्रतियोगिताएँ, डीजे और सबसे बढ़कर—मोबाइल कैमरे। गरबा शुरू होने से पहले ही फोटो और वीडियो बनने लगते हैं। हर कदम रील के लिए, हर पोशाक फोटो के लिए और हर क्षण सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए तैयार रहता है।

सोशल मीडिया और तकनीक हमारे जीवन का हिस्सा हैं। उनका उपयोग करना गलत नहीं है। रील बनाना, तस्वीरें लेना या अपने उत्सव की खुशी दूसरों के साथ साझा करना भी स्वाभाविक है। समस्या तब शुरू होती है, जब माध्यम ही उद्देश्य बन जाता है।

जब गरबा करने वाले युवा माँ की आराधना से अधिक कैमरे की ओर ध्यान देने लगें, जब भक्ति से अधिक लाइक्स की चिंता होने लगे और जब संस्कृति से अधिक प्रदर्शन महत्वपूर्ण हो जाए, तब हमें ठहरकर विचार करने की आवश्यकता है।

क्या हम गरबा कर रहे हैं या केवल गरबा का प्रदर्शन कर रहे हैं?

आज के युवा ऊर्जा, प्रतिभा और रचनात्मकता से भरपूर हैं। यदि यही युवा अपनी संस्कृति को समझकर उसे आधुनिक माध्यमों के साथ प्रस्तुत करें, तो हमारी परंपराएँ और भी प्रभावशाली बन सकती हैं। आवश्यकता आधुनिकता को छोड़ने की नहीं, बल्कि आधुनिकता के साथ अपनी जड़ों को बचाए रखने की है।

गरबा में पहनावा हो—लेकिन उसमें भारतीयता की झलक भी हो।
संगीत हो—लेकिन उसमें मर्यादा और भक्ति का भाव भी हो।
नृत्य हो—लेकिन उसके पीछे माँ शक्ति के प्रति श्रद्धा भी हो।
उत्साह हो—लेकिन उसके साथ अनुशासन और संस्कार भी हों।

युवाओं को यह समझना होगा कि हमारी संस्कृति कोई पुरानी चीज नहीं है, जिसे केवल विशेष अवसरों पर दिखाना है। संस्कृति हमारी पहचान है। जिस समाज की युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति से जुड़ी रहती है, वह समाज अपनी जड़ों से मजबूत रहता है।

इसलिए इस नवरात्रि हमें गरबा को रोकना नहीं है, बल्कि गरबा के मूल भाव को पुनः जागृत करना है। आयोजन भव्य हो सकते हैं, संगीत आधुनिक हो सकता है, सोशल मीडिया का उपयोग भी हो सकता है—लेकिन माँ शक्ति की आराधना और भारतीय संस्कार केंद्र में बने रहने चाहिए।

आइए, इस नवरात्रि युवा शक्ति स्वयं से एक संकल्प ले—

हम गरबा करेंगे, लेकिन अपनी संस्कृति को भूलकर नहीं।
हम आनंद मनाएँगे, लेकिन मर्यादा को छोड़कर नहीं।
हम रील बनाएँगे, लेकिन रील के लिए उत्सव नहीं मनाएँगे।
हम आधुनिक बनेंगे, लेकिन अपनी जड़ों से कटकर नहीं।

क्योंकि गरबा केवल गोल-गोल घूमते कदमों का नाम नहीं है। यह हमें याद दिलाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी आधुनिकता आए, हमारी यात्रा का केंद्र हमारी संस्कृति, हमारी आस्था और हमारी शक्ति ही होनी चाहिए।

आइए, गरबा को फिर से मनोरंजन से साधना, प्रदर्शन से परंपरा और रील से संस्कार की ओर ले जाएँ।

क्योंकि संस्कृति केवल देखने और दिखाने की वस्तु नहीं—
संस्कृति वह है, जिसे हम अपने जीवन में जीते हैं।
 

श्रीमती कांचन त्रिपाठी 
9209973677

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