नागपूर आवृत्ती
व्यक्तिमत्त्व

Shradhye appajijoshi - amol tapase

श्रद्धेय आप्पा जी जोशी - अमोल तपासे

📅 २९ सप्टें, २०२६ ✍️ Shri Amol Tapase 👁 44 वेळा पाहिले
Shradhye appajijoshi - amol tapase
*॥ अर्पण-तर्पण ॥*
*श्रध्देय अप्पाजी जोशी*

स्मृतियां राष्ट्रऋषि की, वंदन आद्य स्वयंसेवक को!

पितृपक्ष केवल पूर्वजों का स्मरण कर जल अर्पित करने का समय नहीं है, बल्कि यह उन राष्ट्रपुरुषों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी पवित्र अवसर है, जिन्होंने मातृभूमि की वेदी पर अपना संपूर्ण जीवन समिधा की भांति होम कर दिया। वर्धा की पावन भूमि पर जन्मे निष्ठावान राष्ट्रसेवक श्री अप्पाजी जोशी एक ऐसे ही त्यागी, निष्काम और तपस्वी जीवन का प्रत्यक्ष उदाहरण थे।

अप्पाजी का बचपन अत्यंत गरीबी और दारुण दुःखों के बीच बीता। महज १२ वर्ष की अल्पायु में ही पिता, चाचा और तीन भाइयों का साया सिर से उठ गया। लेकिन परिस्थितियों के इन कठोर आघातों से उनके भीतर जल रही देशभक्ति की ज्वाला कभी मंद नहीं पड़ी। १९०६ में लोकमान्य तिलक के केवल एक दर्शन के लिए रेलवे स्टेशन जाने पर शिक्षक की मार सहनी पड़ी, पर उस मार ने उनकी पीठ पर जो निशान छोड़े, वे वास्तव में भारत माता की सेवा के प्रथम शिलालेख बन गए।
घर में अठारह हस्त दरिद्रता, १४ वर्ष की उम्र में विवाह और परिवार के भरण-पोषण के लिए वकील के यहाँ मुंशी की नौकरी... इनमें से कोई भी कठिनाई उनके समाज सेवा के मार्ग में बाधा नहीं बन सकी। अण्णा सोहनी के माध्यम से जब वे डॉ. हेडगेवारजी के संपर्क में आए, तो उनके जीवन को एक नई दिशा मिली। क्रांतिकारियों को गुप्त रूप से सहायता सामग्री पहुँचाने से लेकर देश सेवा के हर कठिन मोर्चे पर वे डॉक्टजी के सबसे बड़े सहयोगी बने।

१८ फरवरी १९२६... यह तिथि इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। नागपुर के बाहर, वर्धा में संघ की पहली शाखा शुरू करके अप्पाजी ने संघवृक्ष का पहला बीज बोया। डॉ. हेडगेवार के अलौकिक नेतृत्व को पहचानकर, नवंबर १९२९ की बैठक में उन्हें 'सरसंघचालक' बनाने का ऐतिहासिक प्रस्ताव अप्पाजी ने ही रखा था। १० नवंबर की शाम को स्वयं 'दक्ष' होकर 'सरसंघचालक प्रणाम' का आदेश देने वाले और डॉक्टजी को सरसंघचालक घोषित करने वाले अप्पाजी ही थे।
 १९३४ में महात्मा गांधी को वर्धा के संघ शिविर में लाकर संघ के अनुशासित कार्य से परिचित कराने का ऐतिहासिक कार्य भी उन्होंने ही किया।
अप्पाजी का जीवन 'निष्काम कर्मयोग' की सजीव परिभाषा था। कांग्रेस के काम में आर्थिक स्थिति चरमरा गई, लेकिन जमनालाल बजाज द्वारा दिए गए वेतन के प्रस्ताव को उन्होंने स्वाभिमान के साथ ठुकरा दिया। स्वतंत्रता के बाद जब कई लोगों ने ताम्रपत्र और पेंशन स्वीकार की, तो अप्पाजी ने इसे लेने से साफ मना कर दिया। उनका अटूट विश्वास था— "देश सेवा की कीमत वसूलना पाप है!" आपातकाल के दौरान जेल जाने के बाद भी उन्होंने कभी इसका कोई लाभ नहीं उठाया।
२१ दिसंबर १९८० को इस महान देशभक्त और निष्काम साधक ने अपनी अंतिम सांस ली।
आज इस पितृपक्ष में, अप्पाजी जोशी जैसे महान राष्ट्रपुत्र के चरणों में हमारा वास्तविक तर्पण क्या हो सकता है? उनका निःस्वार्थ जीवन, 'राष्ट्राय स्वाहा, इदं न मम' का भाव और बिना किसी अपेक्षा के देश के लिए समर्पित रहने की उनकी वृत्ती ही उनका सच्चा स्मरण है।

श्रीमंत अप्पाजी जोशी की पावन और त्यागमयी स्मृतियों को कोटि-कोटि नमन... यही हमारा सच्चा अर्पण है, यही हमारा भावपूर्ण तर्पण है!
*अमोल तपासे, नागपूर*
९९६०७७३७८९

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